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इंदौर। इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। रविवार से शुरू हुआ मौत का तांडव बुधवार तक 10वीं जान लील चुका है। ताजा मामले में छह माह की बच्ची की मौत सामने आई है। पहले बुजुर्ग महिला-पुरुष इसकी चपेट में आए और अब मासूम भी इस जहरीले पानी के जाल में फंस रहे हैं। इसके बावजूद प्रशासनिक तंत्र बयान देने तक को तैयार नहीं है।
मौतों की वजह अब किसी से छुपी नहीं है। कुछ दिन पहले इलाके में डाली गई नई नर्मदा पाइपलाइन में सिवरेज का पानी मिल रहा था। जांच में सामने आया कि पानी मिलाने का फॉल्ट टंकी से कुछ ही दूरी पर, भागीरथपुरा पुलिस चौकी के पास मौजूद है। सवाल यह नहीं कि फॉल्ट कहां है, सवाल यह है कि लगातार बढ़ते मौत के आंकड़ों पर लगाम लगाने के बजाय उन्हें दबाने की कोशिश क्यों की जा रही है। मौतें हो रही हैं और जिम्मेदार सिर्फ फाइलों में आंकड़ों की हेराफेरी में जुटे हैं।
भागीरथपुरा क्षेत्र में करीब 30 हजार की आबादी निवास करती है। पूरा इलाका गंदगी से पट चुका है। क्षेत्रीय पार्षद से लेकर निगम अधिकारियों तक का रवैया लगातार सवालों के घेरे में है। 311 ऐप हो या सीधे शिकायत, हर रास्ता बंद नजर आता है। नलों से कई दिनों से गंदा पानी आ रहा था, लेकिन किसी ने संज्ञान लेना जरूरी नहीं समझा। पार्षद कमल वाघेला को लेकर क्षेत्र में पहले से ही विरोध चल रहा है, लेकिन सत्ता का संरक्षण इस विरोध को दबाने के लिए काफी रहा। नतीजा यह हुआ कि गंदे पानी ने इलाके में मौत का तांडव शुरू कर दिया।
कई दिनों से जारी थी समस्या
स्थानीय निवासी आनंद बारे ने बताया कि उनके परिवार के बुजुर्ग जीवनलाल बरेड़े की रविवार को मौत हो गई। उल्टी-दस्त की शिकायत के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उस वक्त यह साफ नहीं था कि मौत की वजह घर के पास बनी पानी की टंकी है, जहां से पीने के पानी के साथ जहर घरों में पहुंच रहा था। शिकायत के लिए दर-दर भटकने के बाद भी कोई सुनवाई नहीं हुई। मजबूरी में इस मौत को किस्मत के नाम पर छोड़ दिया गया।
सिवरेज और वाटर लाइन में घोर लापरवाही
एक निजी कंपनी से जुड़े सिटी इंजीनियर रोहित बेरवा ने बताया कि देश के कई शहरों में यह अनिवार्य नियम है कि किसी भी कॉलोनी में सिवरेज और वाटर लाइन अलग-अलग दिशा में डाली जाती हैं। लेफ्ट-राइट का स्पष्ट ध्यान रखा जाता है, ताकि भविष्य में ऐसी घातक स्थिति न बने। लेकिन इंदौर में या तो ठेकेदारों ने इस नियम को नजरअंदाज किया या निगम के इंजीनियरों ने आंखें बंद कर लीं। जब एक सामान्य व्यक्ति भी अपने मकान में दोनों लाइनों को दूर-दूर रखता है, तो फिर भारी वेतन लेने वाले निगम इंजीनियरों से ऐसी चूक कैसे हो गई। यह सवाल सीधे सिस्टम की कार्यशैली पर तमाचा है। भागीरथपुरा में मौतें सवाल बन चुकी हैं, लेकिन जवाब देने वाला कोई नहीं। प्रशासनिक मौन अब खुद एक अपराध बनता जा रहा है।