पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा उम्मीदवार दिलीप घोष ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर जमकर निशाना साधा। खड़गपुर सदर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे घोष ने आरोप लगाया कि राज्य की स्थिति बांग्लादेश जैसी हो गई है, जहां मंदिरों को तोड़ना और चोरी होना आम बात बन गई है। उन्होंने कहा कि इस बार का चुनाव बदलाव और राज्य में नया राजनीतिक परिदृश्य बनाने के लिए है।
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दिलीप घोष ने स्पष्ट किया कि बंगाल की हालत गंभीर है। उनका कहा कि बंगाल की स्थिति बांग्लादेश जैसी हो गई है। वहां मंदिरों को तोड़ना और मंदिरों में चोरी होना आम बात है। मुर्शिदाबाद के लोग पलायन कर चुके हैं। यह सब ममता बनर्जी के संरक्षण में हो रहा है। इसलिए इस बार परिवर्तन अनिवार्य है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उदाहरण देते हुए कहा कि देश को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है, जो राज्य में सुधार ला सके और आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।
दिलीप घोष खड़गपुर सदर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं। यह वही सीट है जिसे उन्होंने 2016 में जीत हासिल की थी। पश्चिम बंगाल चुनावों में बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच भवानीपुर सीट पर भी कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा। भवानीपुर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का गृह क्षेत्र है। जबकि नंदीग्राम उनके करीबी नेता शुभेंदु अधिकारी का क्षेत्र है, जहां उन्होंने 2021 में ममता को हराया था। यह चुनाव राज्य की राजनीतिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव इस बार दो चरणों में होंगे। पहले चरण के लिए 23 अप्रैल 2026 को मतदान होगा। जबकि दूसरे चरण के लिए वोट 29 अप्रैल 2026 को डाले जाएंगे। मतगणना की प्रक्रिया 4 मई 2026 को पूरी होगी। नामांकन प्रक्रिया की बात करें तो पहले चरण के लिए अंतिम तिथि 6 अप्रैल 2026 है। नामांकन पत्रों की जांच 7 अप्रैल 2026 को होगी और उम्मीदवारों को अपना नामांकन 9 अप्रैल 2026 तक वापस लेने की अनुमति दी जाएगी।
दिलीप घोष का मानना है कि इस चुनाव में बदलाव की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि राज्य में आम जनता की सुरक्षा और सांस्कृतिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए नई राजनीतिक दिशा जरूरी है। उनकी नजरें भाजपा की जीत और ममता बनर्जी के खिलाफ मजबूत संदेश देने पर टिकी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि खड़गपुर सदर और भवानीपुर जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में वोटिंग पैटर्न राज्य की राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं। चुनाव नतीजे केवल सत्ता परिवर्तन ही नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण होंगे।