नेशनल डेस्क। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी शादीशुदा पुरुष का किसी बालिग महिला के साथ सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहना अपराध नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सामाजिक नैतिकता (सोशल मॉरैलिटी) नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती। यह टिप्पणी जस्टिस जेजे मुनीर और तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें एक कपल ने परिवार से जान का खतरा होने की बात कही थी।
सुनवाई के दौरान महिला के परिवार ने दलील दी कि पुरुष पहले से शादीशुदा है, इसलिए उसका दूसरे रिश्ते में रहना गलत है। इस पर अदालत ने कहा कि कानून और सामाजिक नैतिकता को अलग-अलग रखना जरूरी है। कोर्ट के अनुसार, यदि किसी कृत्य को कानून अपराध नहीं मानता, तो केवल सामाजिक सोच के आधार पर व्यक्ति के अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।
[featured type="Featured"]
अदालत के सामने यह तथ्य भी आया कि महिला बालिग है और उसने अपनी इच्छा से उस व्यक्ति के साथ रहने का फैसला किया है। उसने पहले ही पुलिस अधीक्षक को आवेदन देकर अपने निर्णय की जानकारी दी थी। इसके बावजूद परिवार की ओर से विरोध और धमकियों का सिलसिला जारी रहा, जिससे सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई।
हाईकोर्ट ने इस मामले में शक्ति वाहिनी बनाम भारत सरकार का उल्लेख करते हुए कहा कि बालिग जोड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित करना पुलिस की जिम्मेदारी है। अदालत ने पाया कि महिला की शिकायत पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई थी, इसलिए राज्य सरकार को नोटिस जारी कर अगली सुनवाई 8 अप्रैल तय की गई।
[breaking type="Breaking"]
कोर्ट ने अपहरण से जुड़े मामले में याचिकाकर्ताओं महिला पुरुष की गिरफ्तारी पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी। साथ ही महिला के परिवार को चेतावनी दी कि वे किसी भी तरह का हस्तक्षेप न करें। अदालत ने निर्देश दिया कि शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक व्यक्तिगत रूप से इस जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे, ताकि उन्हें किसी प्रकार का खतरा न हो।