पोलैंड। क्या मरे हुए लोग दोबारा जिंदा हो सकते हैं? आज के दौर में यह सवाल व्यर्थ लग सकता है, लेकिन 17वीं सदी के यूरोप में यह डर इतना गहरा था कि लोग मुर्दों को 'कब्र' में भी कैद रखने के लिए रोंगटे खड़े कर देने वाले जतन करते थे। पोलैंड के पिन (Pien) गांव में पुरातत्वविदों ने एक ऐसे ही 'पिशाच कब्रिस्तान' (Vampire Cemetery) की खोज की है, जहां की कब्रें चीख-चीखकर उस दौर के खौफ और अंधविश्वास की कहानी बयां कर रही हैं। यहां मिले कंकालों की हालत देख शोधकर्ता भी दंग रह गए हैं।
प्रोफेसर डेरियस पोलिंस्की के नेतृत्व में चल रही खुदाई के दौरान पिन गांव में 100 से अधिक कब्रें मिली हैं। ये कब्रें आम नहीं हैं। इनमें से कई शवों को 'एंटी-वैम्पायर' तरीके से दफनाया गया था। खुदाई में मिले कंकालों के गले पर लोहे की तेज धार वाली हंसिया (Sickle) रखी गई थी। इतिहासकारों का मानना है कि उस समय के लोगों को डर था कि ये मृत व्यक्ति 'वैम्पायर' बनकर वापस लौट सकते हैं। गले पर हंसिया रखने का मकसद यह था कि यदि मृत व्यक्ति कब्र से उठने की कोशिश करे, तो उसका सिर धड़ से अलग हो जाए। यह उस दौर की चरम असुरक्षा और अलौकिक शक्तियों के प्रति खौफ का जीवंत प्रमाण है।
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इस कब्रिस्तान की सबसे चर्चित खोज एक महिला का कंकाल है, जिसे वैज्ञानिकों ने 'जोसिया' नाम दिया है। जोसिया की कब्र अन्य से काफी अलग और अधिक सुरक्षित बनाई गई थी। उसके गले पर न केवल हंसिया थी बल्कि उसके पैर के अंगूठे में लोहे का एक भारी ताला लगा हुआ था। पुरातत्वविदों के अनुसार पैर में ताला लगाने का अर्थ था कि उसकी आत्मा और शरीर को हमेशा के लिए उस दुनिया में बंद कर दिया गया है। दिलचस्प बात यह है कि जोसिया के सिर पर रेशमी टोपी के अवशेष मिले हैं, जो संकेत देते हैं कि वह एक उच्च सामाजिक वर्ग से ताल्लुक रखती थी। शायद उसकी कोई बीमारी या व्यवहार उसे समाज की नजरों में पिशाच बना गया था।
खुदाई में कुछ ऐसे भी शव मिले हैं जिन्हें औंधे मुंह (पेट के बल) दफनाया गया था। प्राचीन लोक मान्यताओं के अनुसार अगर कोई पिशाच दोबारा जीवित होने की कोशिश करे तो वह बाहर आने के बजाय जमीन के और अंदर खुदाई करने लगे। इसके अलावा कई शवों के सीने और सिर को भारी पत्थरों से दबाया गया था ताकि वे हिल न सकें। एक अन्य कब्र में एक पुरुष के पैरों के पास एक छोटे बच्चे का कंकाल मिला है, जो इस रहस्यमयी कब्रिस्तान की गुत्थियों को और उलझा देता है। यहां एक गर्भवती महिला का कंकाल भी मिला है, जिसका भ्रूण आज भी सुरक्षित अवस्था में है- ऐसी खोजें पुरातत्व विज्ञान में अत्यंत दुर्लभ मानी जाती हैं।
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इतिहासकारों का कहना है कि 17वीं सदी का पोलैंड और पूरा यूरोप युद्ध, अकाल और सिफलिस (Syphilis) जैसी महामारियों से जूझ रहा था। उस समय विज्ञान इतना विकसित नहीं था कि लोग अचानक होने वाली मौतों या शारीरिक विकृतियों का कारण समझ सकें। जो लोग शारीरिक रूप से अलग दिखते थे, जिन्हें मानसिक बीमारियां थीं या जिनकी मृत्यु महामारी के दौरान अचानक हुई ऐसे लोगों को अक्सर 'वैम्पायर' घोषित कर दिया जाता था। यह कब्रिस्तान उन निर्दोष लोगों की त्रासदी का गवाह है जिन्हें समाज ने न केवल जीते जी ठुकराया बल्कि मौत के बाद भी उन्हें भयानक यातनाओं के बीच दफनाया।
प्रोफेसर पोलिंस्की की टीम अभी भी इस स्थल पर काम कर रही है। डीएनए टेस्ट और आधुनिक फॉरेंसिक तकनीक की मदद से अब इन कंकालों के जीवन और उनकी मृत्यु के असल कारणों का पता लगाया जा रहा है। पिन का यह कब्रिस्तान अब दुनिया भर के इतिहासकारों के लिए आकर्षण और भय का केंद्र बन गया है।