Zorawar Light Tank को लेकर सेना की नई मांग बनी चुनौती, बढ़ेगा वजन, 2028-29 तक ही हो पाएगी तैनाती

नई दिल्ली। भारतीय सेना के महत्वाकांक्षी 'जोरावर' लाइट टैंक प्रोजेक्ट के सामने एक बड़ी तकनीकी चुनौती खड़ी हो गई है। सेना ने टैंक की सुरक्षा क्षमता बढ़ाने की मांग की है, यानी इसके कवच को और अधिक मजबूत बनाया जाए। लेकिन शर्त यह भी है कि ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों, विशेषकर चीन से सटे वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर इसकी गतिशीलता पर कोई असर नहीं पड़े। आर्मर को मजबूत करने से टैंक का कुल वजन बढ़ना तय है, जिसके चलते अब इसे और ज्यादा ताकतवर इंजन की जरूरत होगी। इस बदलाव का सीधा असर इसकी समय-सीमा पर पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब जोरावर के 2028-2029 तक ही सेना में शामिल होने की उम्मीद है।
2020 के लद्दाख गतिरोध के बाद हुई थी परिकल्पना
'डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन' (DRDO) और 'लार्सन एंड टुब्रो' (L&T) द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किए जा रहे जोरावर टैंक का आइडिया 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन सैन्य तनाव के बाद आया था। उस दौरान चीन द्वारा अपने टाइप 15 लाइट टैंकों की LAC पर तैनाती के बाद भारत को भी एक ऐसे हल्के और फुर्तीले बख्तरबंद वाहन की जरूरत महसूस हुई जो पहाड़ी युद्ध के लिए उपयुक्त हो। दरअसल, अधिक ऊंचाई पर कम ऑक्सीजन, खड़ी चढ़ाई, संकरे रास्ते और सीमित बुनियादी ढांचा जैसी चुनौतियां भारी भरकम T-72 और T-90 टैंकों की तैनाती और संचालन में बाधा बनती हैं।
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क्या हैं Zorawar की खूबियां
जोरावर को करीब 25 टन के कॉम्बैट वेट पर डिजाइन किया गया है ताकि फायरपावर और मोबिलिटी के बीच संतुलन बना रहे। इसकी एक बड़ी ताकत यह है कि इसे C-17 ग्लोबमास्टर III जैसे ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के जरिए आसानी से एयरलिफ्ट कर सीमावर्ती इलाकों में पहुंचाया जा सकता है। इस टैंक में लगभग 760 हॉर्सपावर वाला कमिंस डीजल इंजन लगा है। साथ ही इसमें बेल्जियम निर्मित 'कॉकरिल 3105' (Cockerill 3105) टरेट लगाया गया है, जिसमें 105mm की मुख्य तोप लगी है।सेना द्वारा बेहतर प्रोटेक्शन की मांग का मतलब है कि अब जोरावर के आर्मर को दुश्मन के और अधिक घातक गोला-बारूद को झेलने में सक्षम बनाना होगा।
अगले और पिछले हिस्सों को ज्यादा मजबूत बनाना है
शुरुआती कॉन्फिगरेशन में STANAG 4569 लेवल 4 के अनुसार सामने से सुरक्षा मिलने की बात कही गई है, जबकि प्रस्तावित जरूरतों में 30mm के आर्मर-पियर्सिंग राउंड (कवच भेदने वाले गोले) के खिलाफ लेवल 6 की सुरक्षा शामिल है। टैंक के किनारों और पिछले हिस्से को और अधिक मजबूत सुरक्षा देने पर भी विचार किया जा रहा है। चुनौती यह है कि टैंक के पावर-टू-वेट रेशियो, एक्सीलरेशन और पहाड़ी पर चढ़ने की क्षमता को बहुत ज्यादा कम किए बिना इन जरूरतों को कैसे पूरा किया जाए।
मॉड्यूलर आर्मर का विकल्प है मजबूत बनाने के लिए
एक विकल्प मॉड्यूलर आर्मर का है, जिसमें बोल्ट-ऑन सिरेमिक सुरक्षा शामिल है। इसके लिए पूरे टैंक को फिर से डिजाइन करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आर्मर और हार्ड-किल एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम जोड़ने से टैंक का वजन बढ़ सकता है। अगर टैंक का वजन 30-32 टन तक पहुंच जाता है, तो इसका मौजूदा इंजन शायद पहले जैसी परफॉरमेंस न दे पाए। ऐसे में इसके लिए ज्यादा शक्तिशाली पावरपैक और अतिरिक्त टेस्टिंग की जरूरत पड़ सकती है।
चीन का 'टाइप 15' टैंक एक उदाहरण हो सकता है
कॉन्पिगरेशन के आधार पर इसका वजन लगभग 33-36 टन है। इसमें 1,000 हॉर्सपावर का इंजन, 105mm की गन और मॉड्यूलर सुरक्षा का इस्तेमाल किया गया है। इसका डिजाइन दिखाता है कि ज्यादा वजन वाला टैंक भी ऊंचाई वाले इलाकों में काम कर सकता है, लेकिन जोरावर की जरूरतें और लॉजिस्टिक्स अलग हैं।
सेना को चाहिए 354 हल्के टैंक
सेना की योजना 354 हल्के टैंक (लाइट टैंक) हासिल करने की है। पहले 59 टैंक DRDO और L&T द्वारा विकसित किए जा रहे हैं। बाकी 295 टैंकों के लिए 'टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स' सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी (लोएस्ट बिडर) बनकर उभरी है। जबकि इस दौड़ में 'महिंद्रा डिफेंस सिस्टम्स' भी शामिल थी। एक चरणबद्ध तरीके (फेज्ड अप्रोच) को अपनाया जा सकता है, जिसमें शुरुआती टैंकों का काम आगे बढ़ता रहे और बाद के टैंकों में बेहतर सुरक्षा जोड़ी जा सके। इस फैसले से यह तय होगा कि क्या जोरावर अपनी उस गतिशीलता (मोबिलिटी) को बनाए रखते हुए अपनी सर्वाइवेबिलिटी को बेहतर कर सकता है, जो इसके मुख्य काम के लिए बहुत जरूरी है।




















