PU Special :विश्व झील दिवस-भोपाल का तीन सीढ़ी तालाब सिस्टम अतिक्रमण में डूबा, स्विट्जरलैंड में हो रही आइस स्केटिंग

भोपाल के तीन सीढ़ी तालाब कभी बारिश के पानी को सहेजने और सिंचाई तक पहुंचाने वाले अनूठे जल प्रबंधन तंत्र का हिस्सा थे। आज मोतिया, नवाब सिद्दीक हसन खां और मुंशी हुसैन खां तालाब अतिक्रमण और सीवेज की मार झेल रहे हैं। वहीं स्विट्जरलैंड के सेंट गालेन ने 400 साल पुराने तालाबों को संरक्षित कर उन्हें पर्यटन केंद्र बना दिया है। वहीं, 18 तालाबों के भोपाल में 16 तालाब सिमट गए हैं। 
विश्व झील दिवस-भोपाल का तीन सीढ़ी तालाब सिस्टम अतिक्रमण में डूबा, स्विट्जरलैंड में हो रही आइस स्केटिंग
एक फ्रेम में भोपाल के तीन तालाब। पहला मुंशी हुसैन खां तालाब, दूसरा नवाब सिद्दीक हसन खां तालाब और तीसरा मोतिया तालाब।

प्रवीण श्रीवास्तव-शाहिद खान, भोपाल। एक ही सोच... पानी को सहेजने की। एक जैसी व्यवस्था... तीन तालाबों की। लेकिन आज तस्वीरें बिल्कुल अलग हैं। स्विट्जरलैंड के शहर सेंट गालेन में 400 साल पुराने तीन तालाबों पर सर्दियों में आइस स्केटिंग होती है, पर्यटकों की भीड़ जुटती है और गर्मियों में लोग तैरने पहुंचते हैं। साल 1610 में बनाए गए इन कृत्रिम जलाशयों का मकसद तब शहर की टेक्सटाइल इंडस्ट्री में कपड़ों की ब्लीचिंग के लिए पानी उपलब्ध कराना और आग बुझाने के लिए जल भंडारण करना था। आज यही तालाब तैराकी, सैर और पिकनिक का ठिकाना हैं। इनके किनारे बनी ऐतिहासिक आर्ट नोव्यू शैली की लकड़ी की इमारतें सेंट गालेन के पुराने टेक्सटाइल इतिहास की याद दिलाती हैं।... अब जरा भोपाल आइए। यहां भी करीब उसी सोच की मिसाल मौजूद है। ‘तीन सीढ़ी तालाब’। फर्क सिर्फ इतना है कि स्विट्जरलैंड ने अपने जल तंत्र को सहेज लिया और भोपाल ने उसे धीरे-धीरे सीवेज, अतिक्रमण और अनदेखी के हवाले कर दिया।

भोपाल में भी था ऐसा ही जल तंत्र 

भोपाल में नवाब शाहजहां बेगम के दौर में बनाए गए तीन सीढ़ी तालाब भी अपने समय के बेहद अनूठे जल प्रबंधन की मिसाल थे। ये तीन तालाब थे-मोतिया तालाब, नवाब सिद्दीक हसन खां तालाब और मुंशी हुसैन खां तालाब। इनकी खासियत सिर्फ यह नहीं थी कि तीन तालाब बनाए गए थे। असली खूबी यह थी कि तीनों को एक-दूसरे से इस तरह जोड़ा गया था कि बारिश का पानी एक तालाब से दूसरे तालाब तक पहुंचता रहे। बारिश होती तो सबसे पहले ऊपर स्थित मोतिया तालाब भरता। जब वह लबालब हो जाता तो उसका अतिरिक्त पानी ओवरफ्लो होकर नवाब सिद्दीक हसन खां तालाब में पहुंचता। यह तालाब भरने के बाद पानी तीसरे तालाब यानी मुंशी हुसैन खां तालाब में चला जाता। इस तरह बारिश का पानी रास्ते में बहकर बर्बाद होने के बजाय सीढ़ी-दर-सीढ़ी जमा होता था। यह पानी आगे सिंचाई के काम आता था। बड़ा बाग हरियाली से घिरा था और बाग निशात अफजा तक पानी पहुंचाया जाता था। मोतिया तालाब ताजुल मसाजिद से सटा होने के कारण नवाबी दौर में इसके पानी का इस्तेमाल नमाजियों के वुजू के लिए भी किया जाता था।

एक तरफ विरासत, दूसरी तरफ अतिक्रमण 

आज यही तीन सीढ़ी तालाब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इनमें सबसे ज्यादा नुकसान नवाब सिद्दीक हसन खां तालाब को हुआ है। सरकारी रिकॉर्ड में यह तालाब खसरा नंबर 160 में दर्ज है। इसका मूल रकबा 11.88 डेसीमल था, लेकिन अब यह करीब 3.99 डेसीमल में सिमट गया है। यानी अतिक्रमण के चलते करीब 7.99 डेसीमल हिस्सा कम हो चुका है।

सीवेज में डूबा जल प्रबंधन का इतिहास 

जिस जगह कभी बारिश की बूंदों को बचाने की योजना बनाई गई थी, वहां आज गंदे पानी और अतिक्रमण का दबाव है। जिस तालाब का अतिरिक्त पानी दूसरे तालाब को भरता था, उसका अपना अस्तित्व ही सिमट गया। सेंट गालेन ने अपने 400 साल पुराने तालाबों को बचाकर पर्यटन की तस्वीर बना दी। भोपाल अपने तीन सीढ़ी तालाबों की पुरानी तस्वीर तक बचा नहीं पा रहा।

विश्व झील दिवस पर भोपाल से एक चेतावनी! झीलें चुपचाप मरती हैं

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          रुचि विजयवर्गीय-डायरेक्टर, पीपुल्स समूह

आज दुनिया दूसरा विश्व झील दिवस मना रही है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 2024 में प्रस्ताव पारित कर 27 अगस्त को विश्व झील दिवस घोषित किया था और पहला आयोजन 2025 में हुआ। लेकिन यह उत्सव नहीं, चेतावनी का दिन है। 

सबूत चाहिए? मध्य एशिया का अरल सागर, जो कभी दुनिया की चौथी सबसे बड़ी झील थी, अपना लगभग 95 प्रतिशत क्षेत्र खो चुका है। करीब 68,000 वर्ग किमी से सिमटकर वह लगभग 3,500 वर्ग किमी रह गया है। बोलीविया की दूसरी सबसे बड़ी झील पूपो 2015 में लगभग पूरी तरह सूख गई। नावें रेत में धंसी रह गईं और मछुआरे पलायन कर गए। अफ्रीका की लेक चाड 1960 के दशक से अब तक अपनी करीब 90 प्रतिशत सतह खो चुकी है, जबकि उस पर लगभग 3 करोड़ लोग निर्भर हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पिछले 50 वर्षों में मीठे पानी की प्रजातियों की आबादी 85 प्रतिशत घट चुकी है।

और हमारा भोजताल? करीब एक हजार साल पुरानी यह झील भोपाल की लगभग 40 प्रतिशत आबादी को पेयजल देती है। 1947 तक इसका पानी बिना ट्रीटमेंट पीया जाता था। आज हालत यह है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण को पिछले महीने ही आदेश देना पड़ा कि तीन सप्ताह में झील क्षेत्र के बचे 72 अतिक्रमण नहीं हटे तो एसडीएम और तहसीलदार व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह होंगे।

उम्मीद भी है। मध्यप्रदेश में अब पांच रामसर साइट हैं: भोज वेटलैंड, सिरपुर, सांख्य सागर, यशवंत सागर और तवा जलाशय। जल गंगा संवर्धन अभियान 2026 में करीब 10 हजार करोड़ रुपए की लागत से 3.62 लाख से अधिक जल संरचनाओं पर काम हुआ।

अरल सागर के किनारे बसे लोग भी कभी यही मानते थे कि झील कहीं नहीं जाएगी। वह चली गई। भोजताल अभी हमारे पास है। सवाल सिर्फ यह है कि कब तक?

बड़ी-छोटी झील पर करोड़ों खर्च होते रहे, बाकी 16 तालाब मिटते गए 

झीलों की नगर भोपाल...यहां बड़ा तालाब और छोटा तालाब है, दरअसल ज्यादातर लोग इन्हीं दो तालाबों के नाम से भोजनगरी को पहचानते हैं पर करीब 50 साल पहले शहर में 18 से ज्यादा छोटे-बड़े तालाब और जलस्रोत थे। ये भोपाल के पुराने दस्तावेजों मेंदर्ज हैं। इनमें बड़ी और छोटी झील के साथ शाहपुरा, मोतिया, सिद्दीक हसन खां, मुंशी हुसैन खां, लेंडिया, सारंगपाणी, पांच नंबर, चार इमली सहित अन्य तालाब और जलाशय शामिल थे।  लेकिन आज इनमें से महज 9 ही अस्तित्व में हैं। बाकी जलस्रोत धीरे-धीरे अतिक्रमण, मलबे, शहरी विस्तार में जमीन में समा गए। विडंबना यह है कि पिछले करीब 30 साल से तालाब संरक्षण के नाम पर सरकारी योजनाओं का बड़ा हिस्सा सिर्फ भोज वेटलैंड में शामिल बड़ी और छोटी झील पर खर्च होता रहा। शहर के बाकी तालाब संरक्षण की प्राथमिकता में ही नहीं आ पाए। नतीजा यह हुआ कि जो 16 जलस्रोत कभी भोपाल के जलतंत्र का हिस्सा थे, उनमें से अधिकांश का वजूद ही मिट गया। तालाब तो सिमटे ही पर चिंता की बात इनमें बढ़ता प्रदूषण है।  मोतिया, सिद्दीक हसन खां, मुंशी हुसैन खां और लेंडिया जैसे जलस्रोत नालों का पानी पहुंच रहा है। छोटा तालाब में 27 नाले मिलते हैं। अगर बड़े तालाब की बात करें तो धीरे-धीरे इसका पानी भी प्रदूषित होता जा रहा है। आईसीएमआर-नीरी की रिपोर्ट में ट्रीटेड सीवेज में 10 से 15 माइक्रोप्लास्टिक कण प्रति लीटर और स्लज में 7 से 9 कण प्रति ग्राम पाए गए। बड़े तालाब में करीब 2.4 और छोटे तालाब में 6.6 माइक्रोप्लास्टिक कण प्रति लीटर मिलने की रिपोर्ट भी सामने आई है।

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बोट क्लब के पास तालाब में गंदा पानी मिल रहा है।
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पीएचक्यू रोड पर भी ऐसा ही हाल है।  

दो तालाबों पर 751 करोड़ खर्च का ऑडिट

1995-2004:  जापानी मदद से भोज वेटलैंड प्रोजेक्ट पर 247 करोड़ खर्च ।

2007-2012  संरक्षण पर 150 करोड़ रुपए खर्च ।

2013-2018  लेक फ्रंट डेवलपमेंट के नाम पर 216 करोड़।

2019:  125 करोड़ रुपए दिए गए।

2023-24: 9 करोड़ रुपए खर्च हुए।

2025-26: 4 करोड़ रुपए का प्रावधान।

अतिक्रमण हटाने की कछुआ चाल

बडेÞ तालाब के कैचमेंट में 5 फरवरी  2026 से शुरू हुए सीमांकन अभियान में 37 दिन में 347 अतिक्रमण चिन्हित किए गए। 92 दिन में सिर्फ 51 छोटे अतिक्रमण ही हटाए जा सके। अब एनजीटी में अगली सुनवाई से पहले प्रशासन ने 21 अतिक्रमण हटाने का प्लान बनया है।  सेवनिया गौंड, गौरा गांव, बिसनखेड़ी, भदभदा, बील गांव, सूरजनगर और प्रेमपुरा जैसे क्षेत्रों में बड़े निर्माण, फार्म हाउस और रिसॉर्ट भी बने हैं। बड़े तालाब के कैचमेंट के अतिक्रमण के खिलाफ पिछले 10 साल में बड़ी कार्रवाई का आंकड़ा भी बहुत कम है। करीब दो साल पहले भदभदा बस्ती के 386 घर हटाए गए थे। इसके बाद लगातार सर्वे और कार्रवाई की योजनाएं बनती रहीं, लेकिन बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी।

इन उदाहरणों से ले सकते हैं सीख

चार जगह झीलों को मिली नई जिंदगी

मानसागर, जयपुर: सीवेज डायवर्जन, गाद प्रबंधन और संरक्षण प्रयासों से प्रदूषित मानसागर झील फिर जीवित हुई।

कैकोंडराहल्ली, बेंगलुरु: स्थानीय समुदाय और विभिन्न संस्थाओं की भागीदारी से  प्रदूषण से प्रभावित झील पुनर्जीवित हुई।

वेस्ट लेक, हांगझोऊ: चीन की इस ऐतिहासिक झील के लिए व्यवस्थित संरक्षण और प्रबंधन योजना लागू की गई।  यूनेस्को विश्व धरोहर के रूप में इसकी सुरक्षा की जाती है।

अरल सागर:  मध्य एशिया में कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान के बीच 1960 में करीब 68 हजार वर्ग किमी में फैला अरल सागर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी झील था। सिंचाई के लिए पानी लेने से इसका जलस्तर तेजी से गिरा और 1987-88 में यह उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों में बंट गया। दक्षिणी अराल लगातार सिकुड़ता गया, जबकि कजाकिस्तान ने उत्तरी हिस्से को बचाने के लिए 2005 में 13 किमी लंबा कोक-अराल बांध बनाया। 2006 में इसका क्षेत्रफल करीब 2,800 वर्ग किमी था, जो 2020 तक बढ़कर करीब 3,400 वर्ग किमी हो गया।

रिपोर्टों और एनजीटी की नजर में भोपाल की झीलें

आईसीएमआर की स्टडी 2026: अपर लेक में औसतन 2.4 माइक्रोप्लास्टिक कण प्रति लीटर और लोअर लेक में 6.6 कण प्रति लीटर मिले। इनमें पॉलीथीन, पॉलीप्रोपाइलीन, पीवीसी और पॉलीएस्टर आदि शामिल थे।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड 2025:  जनवरी-अप्रैल 2025 तक शोध में अपर लेक लगातार ह्यबीह्ण श्रेणी में रही, यानी पानी सीधे पीने लायक नहीं। लोअर लेक, शाहपुरा झील और हथाईखेड़ा बांध में टोटल कोलीफॉर्म की अधिकता मिली, जिसे सीवेज और मानव मल प्रदूषण का संकेत माना।

एनजीटी  मई 2026: भोज वेटलैंड और लोअर लेक से जुड़े मामले में एनजीटी ने कथित अशोधित सीवेज, कचरा, मिट्टी भराव और बफर जोन में निर्माण को गंभीर पर्यावरणीय चिंता माना। कार्रवाई के लिए संयुक्त समिति बनाने के निर्देश दिए।

17 अगस्त 2026:  एनजीटी ने अमृत योजना के तहत बनी सीवेज व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठाते हुए लोअर लेक में नालों के जरिए कथित तौर पर अशोधित सीवेज पहुंचने की जांच के लिए नई समिति बनाने को कहा।

ये हैं जिम्मेदार

प्रशासन

बड़ी झील के कैचमेंट एरिया में हुए सभी चिहिन्त अतिक्रमणों को जल्द हटाया जाएगा।  शहर में जितनी भी झीले हैं,जो अतिक्रमण करके अस्तित्व खो चुकी हैं, उनकी जल्द ही जांच कराई जाएगी। नियमानुसार अतिक्रमण हटाए जाएंगे।

सुमित कुमार पांडेय, एडीएम

नगर निगम

बड़ी झील के संरक्षण के लिए निगम का फोकस सीवेज रोकने, नालों के पानी का उपचार, अतिक्रमण नियंत्रण और नियमित सफाई पर है। झील की जलगुणवत्ता की लगातार निगरानी की जा रही है। माइक्रोप्लास्टिक जैसी नई चुनौतियों को भी गंभीरता से लिया जा रहा है। हमारा लक्ष्य है कि बड़ी झील स्वच्छ और सुरक्षित रहे तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित रहे।

संतोष गुप्ता, प्रभारी झील संरक्षण प्रकोष्ठ, नगर निगम

एमपीपीसीबी

नगर निगम और जिला प्रशासन के साथ मिलकर लगातार तालाबों की मॉनिटरिंग की जाती है। समय समय पर समय-समय पर पानी की गुणवत्ता जांच कर रिपोर्ट तैयार की जाती है।

नितेश चौरसिया, रीजनल ऑफिसर,  मध्य प्रदेश पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड

पीपुल्स समाचार समाधान

जलस्रोतों की सीमा में प्लास्टिक बैग और प्लास्टिक बोतल ले जाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। लगातार बढ़ रहे अतिक्रमण को रोका जाए और पुराने कब्जे हटाए जाएं। इसके साथ ही तालाब पर डाली जाने वाली सामग्री पर तत्काल रोक लगे तो तालाब बच सकते हैं। 

एक्सपर्ट कमेंट

पूरा-जल तंत्र कमजोर होने का संकेत

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भोपाल के तालाबों का संकट सिर्फ अतिक्रमण का संकट नहीं है, यह पूरे जल-तंत्र के कमजोर होने का संकेत है। जब कैचमेंट में निर्माण बढ़ता है तो बारिश के पानी के प्राकृतिक रास्ते बाधित होते हैं और जमीन में पानी का रिसाव कम होता है। इसका असर सीधे तालाब के जलस्तर और भूजल रिचार्ज पर पड़ता है।  नालों के जरिए लगातार गंदा पानी तालाबों में पहुंचने से जैविक प्रदूषण और पोषक तत्वों का स्तर बढ़ता है। तालाब बचाने के लिए केवल सफाई अभियान पर्याप्त नहीं है। कैचमेंट को अतिक्रमण मुक्त करना, हर नाले को सीवेज ट्रीटमेंट से जोड़ना और प्राकृतिक जलप्रवाह को बहाल करना होगा।

सुभाष चंद्र पांडे, पर्यावरणविद्

कचरा निकालना स्थायी समाधान नहीं है

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तालाबों में प्रदूषण का खतरा अब सिर्फ गंदे पानी और दिखाई देने वाले प्लास्टिक तक सीमित नहीं है। शहरी क्षेत्रों से आने वाले सीवेज और बारिश के बहाव के साथ प्लास्टिक कचरे के छोटे कण भी जलाशयों तक पहुंच सकते हैं। बड़े प्लास्टिक के टूटने से बनने वाले माइक्रोप्लास्टिक पानी और तलछट में मौजूद रह सकते हैं तथा जलीय जीवों के संपर्क में आ सकते हैं। यह ऐसा प्रदूषण है जिसे आंखों से देखकर पहचानना संभव नहीं है, इसलिए इसकी नियमित वैज्ञानिक जांच जरूरी है। तालाब की सफाई के नाम पर केवल जलकुंभी या कचरा निकालना स्थायी समाधान नहीं है। जिस नाले से प्रदूषण आ रहा है, वहीं उसे रोकना होगा। सीवेज का पूर्ण उपचार, सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रभावी नियंत्रण, कैचमेंट में निर्माण की निगरानी और पानी व तलछट में माइक्रोप्लास्टिक की जांच-इन चार स्तरों पर काम किए बिना तालाबों की सेहत बहाल करना मुश्किल होगा।

राशिदनूर खान, एनवायरमेंट एक्टिविस्ट

सैटेलाइट इमेजेस में देखिए 1985 से बड़ी झील के कैचमेंट में कैसे बढ़ता गया अतिक्रमण

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1985 शहर का विस्तार झील की ओर बढ़ना शुरू हो चुका था, लेकिन आज की तरह खानूगांव, सूरज नगर, भदभदा व बैरागढ़ जैसे हिस्सों में निर्माण नहीं हुए थे।

 

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2010 कैचमेंट में निर्माण शुरू हो चुके थे। खानूगांव, वीआईपी रोड के झील वाले हिस्से के कैचमेंट में आवासीय निर्माण (पीले घेरे में )तेजी से बढ़ने की शिकायतें आईं।

 

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2020 निर्माण एक हिस्से से निकलकर कई इलाकों तक फैल गया। बैरागढ़, बहेटा, सूरज नगर व खानूगांव में कॉलोनियों, फार्म हाउस और अन्य निर्माण सामने आए। 

 

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2026 पहली बार कार्रवाई में बड़े पैमाने पर जमीन पर दिखाई दी। जिला प्रशासन के सर्वे में 347 अतिक्रमण चिह्नित किए। कार्रवाई की शुरुआत भदभदा से हुई।

Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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