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हर मानसून वही डर और मजबूरी :मुंबई की जर्जर इमारतों में जान जोखिम में डालकर क्यों रह रहे हैं हजारों लोग?

मुंबई में हर साल मानसून के दौरान जर्जर और खतरनाक इमारतों में रहने वाले हजारों परिवार जान जोखिम में डालकर रह रहे हैं। पुनर्विकास अटकने, कानूनी विवाद और किरायेदारी अधिकार खोने के डर से लोग सुरक्षित जगह नहीं जा पा रहे हैं। यह रिपोर्ट मुंबई की पुरानी इमारतों और निवासियों की मजबूरी को उजागर करती है। 
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मुंबई की जर्जर इमारतों में जान जोखिम में डालकर क्यों रह रहे हैं हजारों लोग?
पुनर्विकास रुकने, कानूनी झगड़ों, मकान मालिकों की उदासीनता और अपने पुराने किरायेदारी अधिकार खोने के डर की वजह से लोग ऐसी दुविधा में फंस गए हैं, जहां उन्हें या तो खतरे वाले घर में रहना है या फिर बिना किसी भरोसे के उसे छोड़ना है।

मुंबई में मानसून आते ही एक पुरानी और दर्दनाक कहानी फिर दोहराई जाती है। शहर की सैकड़ों पुरानी और जर्जर बिल्डिंग्स, जिनकी दीवारों में दरारें है और छतें टपकती हैं, फिर भी उनमें हजारों परिवार रह रहे होते हैं। खतरा साफ दिखाई देता है, नोटिस भी लग जाते हैं लेकिन लोग घर छोड़ने को तैयार नहीं होते। वजह सिर्फ एक नहीं , बल्कि कई ऐसी मजब़ुरियां हैं जिनके कारण लोग जान जोखिम में डालकर भी वहीं टिके रहते हैं। यह स्थिति खासतौर पर शहर की उन पुरानी सेस्ड इमारतों (Cessed Buildings) में देखने को मिलती है जो 1969 से पहले बनी थीं और जिनके पुनर्विकास की जिम्मेदारी हाउसिंग अथॉरिटी और मालिकों के बीच उलझी हुई है। हर साल बारिश के दौरान इन बिल्डिंग्स की हालत और खराब हो जाती है, लेकिन समाधान आज भी कागजों और अदालतों में अटका हुआ है।  

पुनर्विकास अटका, उम्मीदें अधूरी

शहर में हजारों इमारतें ऐसी हैं जिनका पुनर्विकास सालों से अधर में लटका हुआ है। कहीं बिल्डर की लापरवाही है, कहीं कानूनी विवाद, तो कहीं जमीन और मालिकाना हक को लेकर झगड़े। किरायेदारों के अधिकारों के लिए काम करने वाले एक संगठन का कहना है कि पहले एक ऐसा प्रावधान था, जिसके तहत यदि मकान मालिक तय समय में पुनर्विकास नहीं करता था, तो किरायेदार खुद भी इस प्रक्रिया की शुरुआत कर सकते थे। हालांकि, फिलहाल यह मामला अदालत में लंबित होने के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहा है।

वहीं हाउसिंग क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि शहर की कई पुरानी इमारतें बेहद खतरनाक स्थिति में पहुंच चुकी हैं, लेकिन कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उलझन के कारण पुनर्विकास की रफ्तार धीमी बनी हुई है। कई परियोजनाएं ऐसी भी हैं जिनकी शुरुआत तो हुई, लेकिन विभिन्न कारणों से वे वर्षों से अधूरी पड़ी हैं। इसके चलते हजारों परिवार अब भी जर्जर भवनों में रहने को मजबूर हैं और सुरक्षित आवास का इंतजार कर रहे हैं।

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अदालतों और नीतियों में फंसा समाधान

कई मामलों में अदालतों ने भी हस्तक्षेप किया है, लेकिन समाधान अब तक स्थायी नहीं हो पाया है। मुंबई की कई इमारतों को "सी1 कैटेगरी" यानी बेहद खतरनाक घोषित किया गया है, लेकिन यह तय नहीं हो पा रहा कि इसे घोषित करने का अधिकार किसके पास है-बीएमसी या हाउसिंग बोर्ड। इसी कानूनी उलझन के चलते पुनर्विकास से जुड़ी कई योजनाएं रोक दी गई हैं। हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक प्रावधान को अस्थायी रूप से रोक दिया, जिससे हजारों परिवारों की उम्मीदों को झटका लगा है।

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हर मानसून बढ़ता खतरा, फिर भी लोग मजबूर

रिपोर्ट में सामने आया है कि मुंबई में करीब चार लाख लोग ऐसी इमारतों में रह रहे हैं जो कभी भी खतरा बन सकती हैं। हर साल मानसून में इन इमारतों में दरारें बढ़ जाती हैं, छतें कमजोर हो जाती हैं और कई जगह हादसे भी होते हैं। फिर भी लोग इन्हें छोड़ नहीं पाते, क्योंकि दूसरी जगह जाने पर उनका भविष्य अनिश्चित हो जाता है। कई किरायेदारों को डर है कि अगर उन्होंने इमारत खाली कर दी, तो उन्हें वापस घर नहीं मिलेगा।

Sona Rajput
By Sona Rajput

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन किया है। साल 2022 ...Read More

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