शाहिद खान, भोपाल। मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद और पुणे जैसे बड़े शहरों में नगर निगम (म्युनिसिपालिटी) न सिर्फ सफाई और पानी जैसी बुनियादी सेवाएं दे रहे हैं, बल्कि मल्टी स्पेशियलिटी और सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल भी संचालित कर रहे हैं। इन अस्पतालों में आम नागरिकों को मुफ्त या बेहद कम खर्च में इलाज मिल रहा है। लेकिन भोपाल में स्थिति उलट है। यहां नगर निगम के पास अपना एक भी अस्पताल नहीं है। इतना ही नहीं, निगम की जो एक डिस्पेंसरी थी, वह भी करीब दो साल पहले बंद हो चुकी है।
बता दें कि करीब 25 लाख आबादी और 700 वर्ग किमी से अधिक क्षेत्र में फैले भोपाल में नगर निगम का स्वास्थ्य ढांचा लगभग नदारद है। निगम कर्मचारियों के लिए संचालित डिस्पेंसरी भी अब बंद पड़ी है, जिससे नगर निगम के 14 हजार से ज्यादा कर्मचारी इलाज के लिए भटक रहे हैं। दूसरी ओर, मुंबई म्युनिसिपल कॉपोर्रेशन के केईएम, सायन और नायर अस्पताल रोजाना हजारों मरीजों का इलाज कर रहे हैं। दिल्ली में हिंदूराव और कस्तूरबा अस्पताल प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र हैं। वहीं अहमदाबाद और पुणे में भी नगर निगम अपने-अपने स्तर पर मजबूत हेल्थ सिस्टम चला रहे हैं।
भोपाल में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह राज्य सरकार पर निर्भर हैं। हमीदिया, जेपी और काटजू जैसे बड़े अस्पताल शहर में जरूर हैं, लेकिन ये सभी स्वास्थ्य विभाग द्वारा संचालित हैं। नगर निगम की इनमें कोई सीधी भूमिका नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से बढ़ती आबादी के हिसाब से नगर निगम स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं का नेटवर्क विकसित होना जरूरी है, ताकि बड़े अस्पतालों पर दबाव कम हो सके।
नगर निगम हर साल करोड़ों का बजट खर्च करता है, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार को लेकर ठोस पहल नजर नहीं आती। सफाई और सौंदर्यीकरण पर खर्च तो हो रहा है, लेकिन शहरी गरीबों के लिए सुलभ इलाज अब भी प्राथमिकता में नहीं है।
नगर निगम कर्मचारियों को प्राथमिक इलाज देने वाली डिस्पेंसरी दो साल से बंद है। इसकी जगह संजीवनी क्लीनिक शुरू करने की बात कही गई, लेकिन अब तक यह शुरू नहीं हो सकी है। इससे 14 हजार से ज्यादा कर्मचारी इलाज के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं।
यह डिस्पेंसरी 1970 के दशक में निगम कर्मचारियों और उनके परिजनों के लिए शुरू की गई थी। अप्रैल 2024 तक यह संचालित रही, लेकिन डॉक्टर के तबादले के बाद इसे बंद कर दिया गया। जब डिस्पेंसरी खोली गई थी, तब पहली डॉक्टर हबीबा सुल्तान आई थीं। इसके बाद दो डॉक्टर और आए। इसके अलावा यहां दो फार्मासिस्ट, कंपाउडर भी थे। 2023 में इनके रिटायर होने के बाद डिस्पेंसरी बंद कर दी गई। कर्मचारीअगर कहीं बाहर इलाज कराते थे तो बिल के आधार पर उनका पूरा खर्च नगर निगम उठाता (प्रतिपूर्ति करता) था।
जानकारों का कहना है कि अगर निगम स्तर पर डिस्पेंसरी, अर्बन हेल्थ सेंटर और छोटे अस्पतालों का नेटवर्क विकसित किया जाए, तो आम लोगों को राहत मिलेगी और सरकारी अस्पतालों पर दबाव भी कम होगा।
मप्र का म्युनिसिपल हेल्थ मॉडल अन्य राज्यों से अलग है। गुजरात, महाराष्ट्र और दिल्ली में जहां नगर निगम अपने अस्पताल संचालित करते हैं, वहीं मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्य सरकार के पास है। शहर में संजीवनी क्लीनिक शुरू होने के बाद निगम की डिस्पेंसरी बंद कर दी गई है। इन क्लीनिकों के माध्यम से नागरिकों को उनके क्षेत्र में ही प्राथमिक उपचार की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।
संस्कृति जैन, आयुक्त, नगर निगम