इस्लामाबाद। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली दूसरे दौर की बातचीत शुरू होने से पहले ही संकट में पड़ गई है। ईरान ने इस वार्ता में शामिल होने से इनकार कर दिया है, जिससे कूटनीतिक प्रयासों को बड़ा झटका लगा है। ईरान का यह फैसला ऐसे समय आया है जब अमेरिका ने दावा किया था कि, इस्लामाबाद में बातचीत का दूसरा दौर शुरू होने वाला है। लेकिन तेहरान ने इसे ‘मीडिया गेम’ करार देते हुए पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अपने पाकिस्तानी समकक्ष इशाक डार से फोन पर बातचीत में अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि, अमेरिका ने पहले भी कई बार भरोसा तोड़ा है और हाल की घटनाएं इसी का उदाहरण हैं। उन्होंने खास तौर पर जून और मार्च 2025 की घटनाओं का जिक्र किया, जब बातचीत जारी रहने के बावजूद ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की गई थी।
अराघची ने यह भी कहा कि, हाल में अमेरिका ने सीजफायर का उल्लंघन किया है और ईरान के बंदरगाहों, तटों और जहाजों को लेकर लगातार धमकी दी जा रही है। उनके मुताबिक, अमेरिका की नीतियां और मांगें स्पष्ट नहीं हैं, बल्कि बार-बार बदलती रहती हैं और कई बार एक-दूसरे के खिलाफ होती हैं। ईरान का कहना है कि, इस तरह के रवैये के साथ किसी भी सार्थक बातचीत की उम्मीद करना मुश्किल है।
ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी IRNA के मुताबिक, इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता से पीछे हटने के पीछे कई अहम कारण हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने अमेरिका की अत्यधिक मांगों, अवास्तविक अपेक्षाओं, बार-बार बदलते रुख और विरोधाभासी बयानों को जिम्मेदार ठहराया है। इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिकी नौसेना की नाकाबंदी को भी ईरान ने युद्धविराम का उल्लंघन बताया है। तेहरान का कहना है कि, जब एक पक्ष लगातार दबाव और धमकी की नीति अपनाता है, तो बातचीत का कोई मतलब नहीं रह जाता। यही वजह है कि उसने दूसरे दौर की वार्ता से दूरी बना ली है।
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में बयान दिया था कि, अमेरिका बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन अगर ईरान समझौते पर नहीं आता, तो उसके महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि, बातचीत के लिए अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान भेजा जा रहा है। हालांकि, ईरान ने इस दावे को खारिज करते हुए इसे दबाव बनाने की रणनीति बताया है।
ट्रंप के इस सख्त रुख ने हालात को और जटिल बना दिया है। एक तरफ बातचीत की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी जा रही है, जिससे स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो गई है।
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका बेहद अहम हो गई है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से फोन पर बातचीत की है। इस बातचीत में क्षेत्र की मौजूदा स्थिति और शांति की संभावनाओं पर चर्चा की गई। शहबाज शरीफ ने ईरानी राष्ट्रपति को सऊदी अरब, कतर और तुर्किये के नेताओं के साथ हुई अपनी हालिया बातचीत के बारे में भी जानकारी दी।
इन सभी प्रयासों का उद्देश्य युद्ध से प्रभावित क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करना है। हालांकि, ईरान के सख्त रुख को देखते हुए यह साफ नहीं है कि पाकिस्तान इस बार कोई ठोस समाधान निकाल पाएगा या नहीं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पाकिस्तान ईरान को बातचीत के लिए तैयार कर पाएगा। पहले दौर की बातचीत भले ही किसी नतीजे पर नहीं पहुंची थी, लेकिन दोनों देशों ने पाकिस्तान की भूमिका की सराहना की थी। इसके बाद पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर का तेहरान दौरा भी हुआ था, जिससे यह संकेत मिला था कि इस्लामाबाद इस मामले को गंभीरता से ले रहा है।
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इस्लामाबाद में बढ़ती कूटनीतिक हलचल के बीच सुरक्षा व्यवस्था को बेहद सख्त कर दिया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी सेना के भारी-भरकम विमान C-17 ग्लोबमास्टर III रावलपिंडी के नूर खान एयरबेस पर उतरे हैं। एयरपोर्ट से इस्लामाबाद के रेड जोन तक जाने वाली सड़कों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है। इसके अलावा, शहर के प्रमुख होटलों सेरेना होटल और मैरियट होटल को खाली कराया जा रहा है और नई बुकिंग पर रोक लगा दी गई है।
गौरतलब है कि, 11 अप्रैल को पहले दौर की बातचीत सेरेना होटल में ही हुई थी, जो करीब 21 घंटे तक चली थी, लेकिन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी थी।
अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच दो हफ्ते का संघर्ष विराम अब खत्म होने के कगार पर है। ऐसे में अगर बातचीत नहीं होती है, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। डोनाल्ड ट्रंप पहले ही संकेत दे चुके हैं कि, अगर कोई समझौता नहीं हुआ, तो युद्धविराम आगे नहीं बढ़ाया जाएगा और सैन्य कार्रवाई तेज की जा सकती है।
इस स्थिति में पूरे मिडिल ईस्ट में बड़े पैमाने पर संघर्ष छिड़ने की आशंका बढ़ गई है, जिसका असर वैश्विक स्तर पर भी देखने को मिल सकता है।