मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच अब कूटनीति ने फिर से रफ्तार पकड़ ली है। युद्ध और टकराव के बीच एक बार फिर बातचीत के जरिए समाधान खोजने की कोशिश शुरू हो गई है। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे परमाणु विवाद को सुलझाने के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद एक बार फिर अहम मंच बनने जा रहा है। दुनिया की नजर अब इस संभावित बैठक पर टिकी हुई है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि जल्द ही इस्लामाबाद पहुंच सकते हैं, जहां सोमवार को औपचारिक बातचीत शुरू होने की संभावना है। हालांकि, अभी तक दोनों देशों की ओर से इस बैठक की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन संकेत हैं कि पर्दे के पीछे तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। डोनाल्ड ट्रंप पहले ही यह संकेत दे चुके हैं कि, बातचीत जल्द शुरू हो सकती है, जिससे इस बैठक की चर्चा और बढ़ गई है।
इससे पहले हुए बातचीत के दौर में कई घंटों तक चर्चा चली, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया। ऐसे में इस बार की वार्ता बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। खास बात यह है कि, पाकिस्तान की मध्यस्थता में लागू किया गया अस्थायी युद्धविराम अब खत्म होने के करीब है। अगर इस बार भी बातचीत विफल रहती है, तो मिडिल ईस्ट में तनाव फिर से भड़क सकता है।
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डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि, दोनों देश समझौते के करीब हैं और ईरान कुछ अहम मुद्दों पर झुक सकता है। लेकिन ईरान के वरिष्ठ अधिकारियों ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि, अभी कई मुद्दों पर सहमति नहीं बनी है। इससे साफ है कि, दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इस पूरे विवाद का केंद्र बना हुआ है। यह दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल गुजरता है। ईरान का कहना है कि, यह रास्ता व्यापारिक जहाजों के लिए खुला है, लेकिन जमीनी हालात कुछ और ही संकेत दे रहे हैं। जहाजों की आवाजाही कम हो गई है और तनाव बना हुआ है।
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ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकिर गालिबफ ने चेतावनी दी है कि, अगर अमेरिका ने अपना नौसैनिक दबाव जारी रखा, तो इस जलमार्ग को फिर से बंद किया जा सकता है। अगर ऐसा होता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर पड़ेगा।
मिडिल ईस्ट के इस संकट में लेबनान का मुद्दा भी काफी अहम है। इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच 10 दिन का युद्धविराम लागू है, जो फिलहाल कायम है, लेकिन उल्लंघन के आरोप भी सामने आ रहे हैं। ईरान हिज्बुल्लाह का समर्थन करता है, इसलिए यह मुद्दा भी अमेरिका-ईरान बातचीत में अहम भूमिका निभा सकता है। क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए लेबनान की स्थिति का शांत रहना जरूरी है।
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पाकिस्तान इस पूरे मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। इस्लामाबाद में पहले भी बातचीत हो चुकी है और अब एक बार फिर यही शहर कूटनीतिक केंद्र बन गया है। हाल ही में कतर के अमीर तमीम बिन हमद अल थानी और तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से मुलाकात की और क्षेत्र में शांति बहाल करने के प्रयासों की सराहना की।
पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने हाल ही में तेहरान का दौरा किया, जहां उन्होंने ईरान के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की। इस दौरान बातचीत को आगे बढ़ाने और माहौल बनाने पर जोर दिया गया। इससे साफ है कि, सिर्फ सार्वजनिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे भी कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो चुकी हैं।