नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल तेज हो गई है। ईरान से जुड़ी सैन्य कार्रवाई और तेल आपूर्ति मार्गों पर खतरे की वजह से दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। इसी संकट के बीच अमेरिका ने एक अहम फैसला लेते हुए भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने की अस्थायी अनुमति दे दी है।
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने भारतीय रिफाइनरियों को 30 दिनों का विशेष लाइसेंस जारी किया है, जिसके तहत भारत रूस से तेल खरीद सकता है। यह छूट केवल सीमित अवधि के लिए है और इसका उद्देश्य वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति को बनाए रखना बताया गया है।
अमेरिका लंबे समय से रूस के ऊर्जा क्षेत्र पर प्रतिबंध लगाए हुए है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने मॉस्को पर कई आर्थिक और ऊर्जा संबंधी पाबंदियां लगाई थीं। लेकिन हालात अब बदलते नजर आ रहे हैं। ईरान से जुड़े युद्ध के कारण वैश्विक तेल बाजार पर भारी दबाव बढ़ गया है। कई प्रमुख सप्लाई रूट प्रभावित हो गए हैं और तेल की कीमतें तेजी से ऊपर जा रही हैं। इसी स्थिति को देखते हुए अमेरिका ने भारत को यह अस्थायी छूट देने का फैसला किया है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने भारतीय रिफाइनरियों को 30 दिन का स्पेशल लाइसेंस दिया है। ये लाइसेंस 3 अप्रैल तक वैलिड रहेगा।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा कि, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ऊर्जा एजेंडा के तहत यह कदम उठाया गया है, ताकि वैश्विक बाजार में तेल का प्रवाह जारी रखा जा सके। उन्होंने अपने बयान में कहा कि, यह छूट केवल अल्पकालिक व्यवस्था है और इसका उद्देश्य रूस को आर्थिक लाभ पहुंचाना नहीं बल्कि बाजार में तेल की कमी को रोकना है।
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) द्वारा जारी लाइसेंस के मुताबिक यह अनुमति सिर्फ उन रूसी तेल शिपमेंट्स पर लागू होगी जो 5 मार्च तक जहाजों पर लोड किए जा चुके हैं। इसका मतलब है कि, यह छूट नए तेल निर्यात के लिए नहीं बल्कि उन कार्गो के लिए है जो पहले से ही समुद्र में मौजूद हैं। इस फैसले से समुद्र में इंतजार कर रहे कई तेल टैंकरों को अब अपनी डिलीवरी पूरी करने का रास्ता मिल जाएगा।
दरअसल, हाल ही में अमेरिका ने रूसी तेल से जुड़ी कई शिपिंग कंपनियों और टैंकरों पर सख्त प्रतिबंध लगाए थे। इन प्रतिबंधों के कारण कई तरह की समस्याएं पैदा हो गई थीं।
मुख्य कारण थे-
इन कारणों से कई तेल टैंकरों को समुद्र में ही इंतजार करना पड़ा। खरीदार देश भी यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि तेल खरीदना कहीं प्रतिबंधों का उल्लंघन न माना जाए। भारत की तेल रिफाइनरियों ने भी कुछ समय के लिए इंतजार करने की रणनीति अपनाई थी।
ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत की सरकारी तेल कंपनियां रूसी कच्चे तेल की खरीद के लिए पहले से ही सक्रिय हो गई हैं। इनमें प्रमुख कंपनियां शामिल हैं-
बताया जा रहा है कि, भारतीय रिफाइनरियों ने व्यापारियों से लगभग 20 मिलियन बैरल रूसी कच्चा तेल खरीदने की तैयारी कर ली है। कुछ कंपनियों के लिए यह कदम रूसी तेल की आपूर्ति की वापसी का संकेत भी माना जा रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ भारतीय रिफाइनरियों को रूस से आखिरी बार कच्चे तेल की खेप नवंबर में मिली थी। उसके बाद प्रतिबंधों और अनिश्चितताओं के कारण सप्लाई धीमी हो गई थी। अब अमेरिका द्वारा दी गई इस छूट के बाद रूसी तेल की सप्लाई फिर से बढ़ने की संभावना बन गई है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत दुनिया के सबसे बड़े रूसी तेल खरीदारों में से एक बनकर उभरा था। भारत ने अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद रूस से तेल खरीदना जारी रखा था। भारत का स्पष्ट कहना था कि, अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए वह स्वतंत्र रूप से निर्णय लेगा। रूस भी भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में रियायती कीमतों पर तेल उपलब्ध कराता रहा है। इसी वजह से भारत के लिए रूसी तेल एक महत्वपूर्ण विकल्प बना हुआ है।
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भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का उपभोक्ता देश है। देश अपनी कुल जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में सस्ते और स्थिर सप्लाई स्रोत भारत के लिए बेहद जरूरी हैं। रूसी तेल भारत के लिए कई वजहों से महत्वपूर्ण है-
सस्ता विकल्प
रूस अक्सर अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क कीमतों से कम दरों पर तेल देता है।
सप्लाई की स्थिरता
मिडिल ईस्ट में तनाव होने पर रूस एक वैकल्पिक सप्लायर बन जाता है।
महंगाई नियंत्रण
सस्ता कच्चा तेल मिलने से देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर रखने में मदद मिलती है।
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है। ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ब्लॉक किए जाने की खबरों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। यह समुद्री मार्ग दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल सप्लाई के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। अगर यहां से जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो पूरी दुनिया में तेल की कीमतों पर असर पड़ सकता है।
मिडिल ईस्ट के तनाव का असर वैश्विक बाजार में साफ दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार,
इन घटनाओं ने वैश्विक बाजार में चिंता बढ़ा दी है।
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ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक इस समय लगभग 95 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल एशियाई समुद्री क्षेत्र में टैंकरों में मौजूद है और खरीदार का इंतजार कर रहा है। भारत इन टैंकरों को तुरंत रिसीव कर सकता है। इससे दो फायदे होंगे-
इसलिए भारत इन कार्गो को खरीदने पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव ने यह भी कहा कि भारत अमेरिका का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। उन्होंने उम्मीद जताई कि, इस अस्थायी व्यवस्था के बाद भारत अमेरिकी तेल की खरीद भी बढ़ाएगा। अमेरिका का मानना है कि, इससे वैश्विक बाजार में संतुलन बना रहेगा और तेल की कमी नहीं होगी।
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ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बावजूद फिलहाल भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी की संभावना कम मानी जा रही है। सरकार और तेल कंपनियां बाजार की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। अमेरिका द्वारा दी गई यह अस्थायी छूट भारत की सप्लाई चेन को संभालने में मदद कर सकती है।
मिडिल ईस्ट का संकट, रूस पर प्रतिबंध, और वैश्विक तेल बाजार में बढ़ती अस्थिरता ने ऊर्जा राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। अमेरिका द्वारा भारत को दी गई यह अस्थायी छूट इसी बदलते वैश्विक समीकरण का हिस्सा मानी जा रही है।
अब दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि, आने वाले दिनों में तेल बाजार किस दिशा में जाता है और क्या यह अस्थायी राहत लंबे समय के समाधान में बदल पाएगी या नहीं।