वॉशिंगटन डीसी। मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान ने जिस रणनीति को अपनी ताकत समझा था, वही अब उसके लिए सबसे बड़ी कमजोरी बनती जा रही है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बिछाई गई समुद्री बारूदी सुरंगें अब ईरान के लिए गंभीर चुनौती बन गई हैं। हालात ऐसे हैं कि ईरान खुद यह नहीं जान पा रहा कि उसने ये माइनें कहां-कहां बिछाई थीं। इस वजह से इस अहम समुद्री रास्ते को सुरक्षित तरीके से दोबारा खोलना बेहद मुश्किल हो गया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा सप्लाई के लिए बेहद अहम माना जाता है। दुनिया का करीब पांचवां हिस्सा कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है, जिससे एशिया, यूरोप और अमेरिका जैसे बड़े क्षेत्रों की ऊर्जा जरूरतें पूरी होती हैं। ऐसे में अगर इस रास्ते में कोई रुकावट आती है, तो उसका असर सीधे वैश्विक बाजार और तेल की कीमतों पर पड़ता है। यही कारण है कि यहां पैदा हुआ संकट पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन गया है।
फरवरी-मार्च 2026 में अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते तनाव के बाद ईरान ने आक्रामक रणनीति अपनाई। छोटे-छोटे नावों के जरिए समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछाई गईं और 2 मार्च को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने जलडमरूमध्य को बंद घोषित कर दिया। इसके साथ ही जहाजों को चेतावनी दी गई कि इस रास्ते से गुजरने पर उन्हें निशाना बनाया जा सकता है। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय शिपिंग पर बड़ा असर पड़ा, तेल के टैंकरों की आवाजाही कम हो गई और वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में तेजी आ गई।

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ईरान ने माइनें बेहद अव्यवस्थित तरीके से बिछाईं। कई जगहों पर इनका कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया और जहां रिकॉर्ड था भी, वह अधूरा है। समुद्री धाराओं के कारण कई माइनें अपनी जगह से बह गईं या खिसक गईं, जिससे उनकी सटीक लोकेशन पता करना और भी मुश्किल हो गया है। यही वजह है कि, अब ईरान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह खुद नहीं जानता कि खतरा कहां-कहां मौजूद है।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने खुद जहाजों को चेतावनी दी है कि, वे बारूदी सुरंगों से टकरा सकते हैं। हालांकि, कुछ सीमित सुरक्षित रास्तों के नक्शे जारी किए गए हैं, लेकिन ये रास्ते बहुत संकरे और जोखिम भरे हैं। इसका मतलब है कि, पूरा जलमार्ग अभी भी सुरक्षित नहीं है और किसी भी समय हादसे की आशंका बनी हुई है।
ईरान ने पूरी तरह रास्ता बंद नहीं किया है, बल्कि एक संकरा रास्ता खुला रखा है, जहां से जहाजों को टोल देकर गुजरने की अनुमति दी जा रही है। हालांकि, यह व्यवस्था सीमित है और सभी जहाजों के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके अलावा इस रास्ते में भी जोखिम बना हुआ है, जिससे शिपिंग कंपनियां पूरी तरह भरोसा नहीं कर पा रही हैं।
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अमेरिका इस मुद्दे को लेकर लगातार दबाव बना रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ तौर पर कहा है कि किसी भी संभावित दो हफ्ते के सीजफायर के लिए जरूरी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह, तुरंत और सुरक्षित तरीके से खोल दिया जाए। यह शर्त ईरान के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है, क्योंकि मौजूदा हालात में ऐसा करना आसान नहीं है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने स्वीकार किया है कि, जलडमरूमध्य को तकनीकी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए ही खोला जा सकता है। यह बयान सीधे तौर पर माइन हटाने में आ रही दिक्कतों की ओर इशारा करता है। यानी ईरान के पास न तो पर्याप्त संसाधन हैं और न ही सटीक जानकारी, जिससे वह जल्दी इस समस्या का समाधान कर सके।
जानकारी के मुताबिक, समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछाना जितना आसान होता है, उन्हें ढूंढकर हटाना उतना ही मुश्किल होता है। इसके लिए विशेष तकनीक, प्रशिक्षित टीम और आधुनिक जहाजों की जरूरत होती है। अमेरिका के पास भी यह क्षमता सीमित है, जबकि ईरान के पास संसाधन और भी कम हैं। ऐसे में इस पूरे ऑपरेशन में समय और जोखिम दोनों ज्यादा हैं।
हालांकि, अमेरिकी हमलों में ईरान की नौसेना को नुकसान पहुंचा है, लेकिन उसके पास अब भी सैकड़ों छोटी नावें मौजूद हैं। ये नावें फिर से माइन बिछाने या जहाजों को परेशान करने में सक्षम हैं। यही कारण है कि, खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और स्थिति अभी भी अस्थिर बनी हुई है।
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इस पूरे संकट के बीच पाकिस्तान के इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता चल रही है। ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व अब्बास अराघची कर रहे हैं, जबकि अमेरिकी पक्ष का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे हैं। इस वार्ता में होर्मुज जलडमरूमध्य का मुद्दा सबसे अहम एजेंडा बना हुआ है, क्योंकि यही संकट क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता को प्रभावित कर रहा है।
हालांकि, फिलहाल दो हफ्ते का सीजफायर लागू है, लेकिन दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। अमेरिका का कहना है कि ईरान शर्तों का पालन नहीं कर रहा, जबकि ईरान का आरोप है कि इजरायल अब भी हमले जारी रखे हुए है। ऐसे में होर्मुज का मुद्दा इस युद्धविराम को स्थायी शांति में बदलने में बड़ी बाधा बन गया है।
होर्मुज में पैदा हुआ यह संकट सिर्फ क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर असर डाल रहा है। तेल की कीमतों में तेजी आई है, शिपिंग लागत बढ़ी है और सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं और दुनिया भर में महंगाई बढ़ने का खतरा है।