अमेरिका जिस आत्मविश्वास के साथ ईरान में घुसा था, वो अब कमजोर नजर आने लगा है। केवल एक हफ्ते तक चलने वाले ऑपरेशन एपिक फ्यूरी का जिक्र किया गया था, लेकिन 20वें दिन भी कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। ईरान अपनी स्थिति मजबूत बनाए हुए है और अमेरिका का तनाव बढ़ता जा रहा है। विशेषज्ञ और राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि डोनाल्ड ट्रंप खुद इस जटिल स्थिति से कैसे बाहर निकलेंगे।
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमला शुरू करने से पहले कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी तक नहीं ली। अब यही निर्णय उनका सबसे बड़ा चक्रव्यूह बनता जा रहा है। विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि ट्रंप ने देश को बिना स्पष्ट जनमत के नए संघर्ष में झोंक दिया, लेकिन हैरानी की बात यह है कि उनके अपने समर्थक भी असहज हो चुके हैं।
ट्रंप का MAGA बेस, जो उन्हें चुनने के पीछे सबसे बड़ी वजह था, अब असंतुष्ट है। ये लोग वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान जैसे अंतहीन युद्धों के खिलाफ थे। ट्रंप, जो खुद को शांतिदूत साबित करने की कोशिश कर रहे थे, अब उसी युद्ध में फंस गए हैं, जिसका कोई अंत नजर नहीं आता। जैसे-जैसे संघर्ष बढ़ता जा रहा है, उनके समर्थकों में उत्साह की जगह चिंता और डर हावी हो गया है।
इस्लामिक रिपब्लिक की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि सिर्फ बमबारी से उन्हें उखाड़ा नहीं जा सकता। होर्मुज स्ट्रेट में तेल की आवाजाही बाधित है और ट्रंप का फ्री फ्लो ऑफ ऑयल का वादा अधूरा रह गया है। अमेरिका अब बिना शर्त सरेंडर की धमकी दे रहा है, लेकिन सवाल यही है कि वास्तव में कौन सरेंडर करेगा।
ईरान ने गल्फ देशों के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले तेज कर दिए हैं। उदाहरण के तौर पर कतर के रास लाफान गैस प्लांट पर दो हमले, अबू धाबी में गैस ऑपरेशंस रोके गए और सऊदी अरब ने ड्रोन रोकने और चेतावनी जारी करने का कदम उठाया। ट्रंप ने खुद कहा कि उन्हें इजरायल के साउथ पार्स फील्ड पर हमले की जानकारी नहीं थी।
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मिड-टर्म चुनाव सिर पर हैं और अमेरिकी मतदाता अपनी जेब की चिंता ज्यादा कर रहे हैं। रिपब्लिकन नीति निर्माता परेशान हैं। पूर्व काउंटरटेररिज्म चीफ जो केंट ने इस्तीफा देते हुए कहा कि ईरान का कोई बड़ा स्नीक अटैक वाला इंटेलिजेंस नहीं था और वह परमाणु बम बनाने के करीब भी नहीं था। उन्होंने साफ कहा कि इजरायल ने अमेरिका को इस संघर्ष में घसीट लिया। सीनेट में रिपब्लिकन ने ट्रंप की वॉर पावर्स रोकने वाली रेजोल्यूशन खारिज कर दी, लेकिन विवाद और बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी जनता में असंतोष बढ़ रहा है और राष्ट्रपति की लोकप्रियता लगातार गिर रही है।
1953 में अमेरिका ने शाह को गद्दी पर बिठाने के लिए तख्तापलट किया था, जिसके चलते 1979 में ईरान क्रांति हुई। अब 2026 में ट्रंप वही गलती दोहरा रहे हैं। ईरानी जनता आधुनिकता और स्वतंत्रता का वादा महसूस नहीं कर पा रही। अमेरिकी हमले के बावजूद ईरान अपनी स्थिति मजबूत बनाए हुए है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर ट्रंप जल्द ही तेल की आवाजाही बहाल नहीं कर पाए, तो यह युद्ध उनकी राजनीतिक और ऐतिहासिक गलती के रूप में याद रखा जाएगा। अमेरिका का आत्मविश्वास डगमगाया है, लेकिन ईरान ने अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखते हुए संघर्ष को लंबा कर दिया है।