जो ऑफटिज्म पीड़ित नहीं कर पाते थे खुद का काम, दिवाली पर तैयार कर रहे मठरी-लड्डू, गिफ्ट्स

बच्चों को क्रिएटिविटी से जोड़ा, व्यवहार में आया पॉजिटिव चेंज
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जो ऑफटिज्म पीड़ित नहीं कर पाते थे खुद का काम, दिवाली पर तैयार कर रहे मठरी-लड्डू, गिफ्ट्स

पल्लवी वाघेला-भोपाल। मठरी तलते वक्त तेल का ध्यान रखो, मनु..तुम सुई में धागा डालो... राजू...तुम बुक मार्क के लिए फेविकॉल लगाओ। ये दृश्य है बैरसिया रोड स्थित ऑफटिज्म पीड़ित बच्चों की संस्था आनंदम का। आनंदम-आटिज्म मित्र संस्था के अनुसार एक समय ऐसा भी था, जब इनमें से अनेक खुद का दैनिक काम भी अपने हाथों नहीं कर पाते थे। अब दिवाली पर इन सभी ने पेपर बैग, की-चेन, पेटिंग और दिवाली स्पेशल मठरी और लड्डू तैयार किए हैं। यह सामान उनके पैरेंट्स और संस्था में आने वाले लोग खरीद रहे हैं।

मुश्किल होता है सिखाना

माना जाता है कि आटिज्म पीड़ित बच्चों की देखभाल मुश्किल काम है। आनंदम हॉस्टल इस मिथ को तोड़ता नजर आ रहा है। यहां रह रहे ऑफटिज्म पीड़ित सुचारू दिनचर्या के साथ दैनिक नित्यकर्म बखूबी करने लगे हैं। बच्चों की रुचि और व्यवहार के अनुसार उन्हें एक्टिविटी से जोड़ते हैं।

पॉजिटिव रिस्पांस

स्पेशल टीचर आदेश तोमर ने बताया कि जब से बच्चों ने यह सब बनाना शुरू किया है, तब से उनके अंदर बड़ा बदलाव देखने को मिला है। हाथों व आंखों के समन्वय की वजह से पॉजिटिव चेंज नजर आता है। वह बताते हैं कि बच्चे अब कुकिंग तक खुद करने लगे हैं।

यहां रहते हुए बच्चों की दिनचर्या व्यवस्थित और नियमित हो गई है। इन एक्टिविटी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ा है। आटिज्म पीड़ित बच्चे कई बार एग्रेशन दिखाते हैं, यह समस्या अब नहीं है। - डॉ. नवीन अग्रवाल, सचिव, आनंदम-आटिज्म मित्र

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