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Organic Farming :भाई को कैंसर हुआ तो जबलपुर के तन्मय ने 24 लाख की नौकरी ठुकराकर जैविक खेती को बनाया करियर

जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के छात्र तन्मय दास ने इसे कर दिखाया है। 24 लाख सालाना पैकेज की जॉब ठुकराकर जैविक खेती को अपना करियर बनाया।
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भाई को कैंसर हुआ तो जबलपुर के तन्मय ने 24 लाख की नौकरी ठुकराकर जैविक खेती को बनाया करियर
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    सिद्धार्थ तिवारी, जबलपुर। संस्कारधानी के तन्मय दास के मन में जैविक खेती को करियर बनाने का विचार 2023 में आया था। दरअसल, तब उसके बड़े भाई को पेट का कैंसर हो गया। टाटा मेमोरियल मुंबई में इलाज के दौरान डॉक्टरों ने इसकी वजह जेनेटिक या फिर खानपान में गड़बड़ी बताई थी। हालांकि उसके बड़े भाई अब स्वस्थ हैं और आईआईटी रुड़की से इंजीनियरिंग के बाद सिविल सेवा की तैयारी कर रहे हैं। तन्मय बताते हैं, कैंपस प्लेसमेंट के दौरान उसे 24 लाख पैकेज का ऑफर मिला। जब मैंने परिवार को जैविक खेती को करियर बनाने के बारे मे बताया तो कोई खुश नहीं था। हालांकि बाद में मान गए। पिता जबलपुर में स्कूल संचालित करते हैं और मां वहां प्राचार्य हैं। तन्मय अभी एकीकृत कृषि कर 80 हजार रुपए महीना कमा रहे हैं।

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    एकीकृत कृषि प्रणाली से बदली तस्वीर 

    करीब दो वर्ष पहले तन्मय ने पाटन के ग्राम लम्हेटा में साढ़े तीन एकड़ जमीन लेकर एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाई। जैविक फसलों (धान, गेहूं, सब्जी) के साथ पशुपालन, मुर्गी पालन, बकरी पालन, मछली पालन और बत्तख पालन को जोड़ा।

    गोशाला और जैविक उत्पाद

    तन्मय ने एक छोटी गोशाला भी बनाई है। यहां गोबर और गोमूत्र से जैविक खाद तैयार की जाती है। जबलपुर में हर रविवार को कृषि उपज मंडी में जैविक फसलों का बाजार लगता है। इसमें उनके उत्पादों की विशेष मांग रहती है।

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    खेत में तालाब, तालाब में जीवन

    तन्मय ने खेत में 10 फीट गहरा तालाब खुदवाया है। इसमें रोहू और कतला प्रजाति की मछलियों के साथ बत्तखें पाली जा रही हैं। बत्तखों का मल मछलियों के लिए आहार बनता है और पानी में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने में सहायक होता है। तालाब का पानी सिंचाई में उपयोग होता है, जिससे लागत घटती है।

    धान की नई पद्धति से अधिक उत्पादन

    वह जैविक पद्धति से धान की खेती भी करते हैं। धान की कटाई के बाद बची पराली को खेत में ही मिलाकर गेहूं की बुवाई की जाती है। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हुई है और उत्पादन में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। तन्मय के इन नवाचारों को देखने कृषि अधिकारी भी उनके खेत का भ्रमण कर चुके हैं। उनका मॉडल अब क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा बन रहा है।

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    तन्मय ने छोटी उम्र में बड़ा काम किया

    तन्मय ने बहुत छोटी उम्र में जैविक खेती का महत्व समझा और उसे आगे बढ़ाने के लिए मेहनत की। आज वह सफल उद्यमी है।

    डॉ. इंदिरा त्रिपाठी, अनुविभागीय कृषि अधिकारी पाटन, जबलपुर

    Naresh Bhagoria
    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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