नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 2027 में होने वाली जनगणना के दौरान की जाति दर्ज करने, उनके वर्गीकरण और सत्यापन की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया है। SC ने साफ कहा कि वह इस मुद्दे पर फिलहाल हस्तक्षेप नहीं करेगी हालांकि, शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता की चिंताओं को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया।
SC ने केंद्र सहित रजिस्ट्रार जनरल से मांगे सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और भारत के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त के कार्यालय से कहा है कि याचिका में दिए गए सुझावों पर वे प्रशासनिक स्तर पर विचार करें। याचिका में दावा किया गया था कि जाति से जुड़े आंकड़े जुटाने की मौजूदा प्रक्रिया में पारदर्शिता और सत्यापन को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं।
याचिकाकर्ता- निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो गलत आंकड़े सामने आएंगे
याचिकाकर्ता का कहना था कि अगर सही वर्गीकरण और जांच नहीं हुई, तो इससे गलत आंकड़े सामने आ सकते हैं, जिनका असर नीतियों और कल्याण योजनाओं पर पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि जनगणना नीति से जुड़ा मामला कार्यपालिका के दायरे में आता है और इस स्तर पर न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी नहीं है। अब इस मुद्दे पर आगे की कार्रवाई केंद्र सरकार और जनगणना प्राधिकरण के फैसलों पर निर्भर करेगी।
SC- आंकड़ों की पहचान के लिए पहले से मौजूद डेटा उपलब्ध नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने 2027 की जनगणना में जाति से जुड़े आंकड़ों की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए अपनी अहम टिप्पणी दी है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि जाति संबंधी आंकड़ों की पहचान के लिए कोई पहले से तय या पूर्व-निर्धारित डेटा मौजूद नहीं है।
आगे शीर्ष अदालत ने कहा कि जनगणना की पूरी प्रक्रिया जनगणना अधिनियम 1958 और उसके तहत बने 1990 के नियमों के अनुसार संचालित होती है। इन नियमों के तहत संबंधित अधिकारियों को यह अधिकार दिया गया है कि वे तय करें कि जनगणना किस तरीके से होगी और किन बिंदुओं पर जानकारी जुटाई जाएगी। ऐसे में इस स्तर पर न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी नहीं है।
जानें याचिका में क्या उठाई गई मांग
यह याचिका शिक्षाविद आकाश गोयल ने दायर की थी, जिनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने पक्ष रखा। याचिका में मांग की गई थी कि जाति की जानकारी दर्ज करने, उसके वर्गीकरण और सत्यापन के लिए अपनाई जाने वाली प्रश्नावली को सार्वजनिक किया जाए, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि जनगणना संचालन निदेशालय ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि नागरिकों की जाति पहचान दर्ज करने के लिए कौन-से मानदंड अपनाए जाएंगे, जबकि इस बार जाति गणना का दायरा अनुसूचित जाति और जनजाति से आगे बढ़ाया जा रहा है।