सेंसेक्स 125 अंक फिसला, निफ्टी 88 अंक गिरकर 22600 पर बंद; मेटल और रियल्टी सेक्टर में बिकवाली

भारतीय शेयर बाजार में आज कारोबार के दौरान काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। दिन की शुरुआत और कारोबार के दौरान बाजार में तेजी के बाद बिकवाली हावी हुई। सेंसेक्स अपने दिन के ऊपरी स्तर से करीब 1,314 अंक नीचे आ गया और आखिर में 125 अंक की गिरावट के साथ 73,124 पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी भी 88 अंक टूटकर 22,600 के करीब बंद हुआ। बाजार में मेटल, रियल्टी और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स समेत कई सेक्टरों में दबाव देखने को मिला।
मेटल और रियल्टी सेक्टर में दबाव
NSE के सेक्टोरल इंडेक्स के आंकड़ों के मुताबिक मेटल और रियल्टी सेक्टर में कमजोरी रही। निफ्टी मेटल इंडेक्स 2.71% गिरा जबकि निफ्टी रियल्टी इंडेक्स में 2.38% की गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स इंडेक्स 2.63% और निफ्टी केमिकल्स इंडेक्स 2.32% नीचे रहा। निफ्टी PSU बैंक इंडेक्स में 2.26% तथा निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज एक्स-बैंक इंडेक्स में 2.19% की गिरावट आई। निफ्टी मिडस्मॉल फाइनेंशियल सर्विसेज इंडेक्स भी 2.78% गिरा।
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दिन की तेजी पर बिकवाली हावी
कारोबार के दौरान बाजार में उतार-चढ़ाव बना रहा। शुरुआती तेजी के बाद निवेशकों की बिकवाली से प्रमुख सूचकांकों ने अपनी बढ़त गंवा दी। सेंसेक्स दिन के ऊपरी स्तर से करीब 1,314 अंक नीचे आ गया। हालांकि कारोबार के अंत में सेंसेक्स की गिरावट 125 अंक तक सीमित रही। दूसरी ओर निफ्टी 50 करीब 88 अंक गिरकर 22,600 के स्तर के आसपास बंद हुआ।
विदेशी निवेशकों ने बेचे ₹3,459 करोड़ के शेयर
शेयर बाजार पर विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली का दबाव बना हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 22 अक्टूबर को विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार में करीब 3,459 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। दूसरी ओर, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने लगभग 2,891 करोड़ रुपये की खरीदारी की। घरेलू निवेशकों की खरीदारी से बाजार को सहारा मिला लेकिन विदेशी निवेशकों की बिकवाली के दबाव को पूरी तरह संतुलित नहीं किया जा सका।
कच्चे तेल की कीमत 113.5 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंची
बाजार में गिरावट की एक प्रमुख वजह कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भी रहीं। सऊदी अरब पर हूती हमलों के बाद ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ी, जिससे ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 113.5 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ने, महंगाई पर दबाव पड़ने और कंपनियों की लागत बढ़ने की आशंका रहती है। इससे कंपनियों के मुनाफे और उपभोक्ताओं की खर्च करने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। इसी चिंता ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया।



















