सीहोर की मिट्टी में आजादी का इतिहास: 1824 के चैन सिंह से 1857 की सिपाही बहादुर सरकार तक

सीहोर। देश 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाता है तो तिरंगे के साथ उन अनगिनत वीरों की याद भी आती है, जिन्होंने आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। सीहोर की मिट्टी भी ऐसे ही बलिदानों की गवाह रही है। 1857 की क्रांति में यहां अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने के साथ ऐसी सिपाही बहादुर सरकार स्थापित हुई थी, जो हिंदू-मुस्लिम एकता और स्वराज की भावना का प्रतीक बनी। इससे भी पहले 1824 में दशहरा वाले बाग में कुंवर चैन सिंह और उनके साथियों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए प्राण न्योछावर किए थे।
1824 में कुंवर चैन सिंह और साथियों ने लड़ी थी लड़ाई
इतिहास विज्ञ रघुवर दयाल गोहिया के अनुसार, वर्ष 1824 में नरसिंहगढ़ रियासत के राजकुमार कुंवर चैन सिंह और उनके साथियों ने सीहोर के दशहरा वाले बाग में अंग्रेजों के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ी थी। इस संघर्ष में करीब 45 देशभक्त शहीद हुए थे। कुंवर चैन सिंह के विश्वस्त साथी हिम्मत खां और बहादुर खां भी इसी संघर्ष में शहीद हुए। आज भी उनकी कब्रें कुंवर चैन सिंह की छत्री के सामने स्थित हैं। ऐसा लगता है जैसे ये दोनों वीर आज भी अपने राजकुंवर की हिफाजत में खड़े हों।
अंग्रेजों की नाक के नीचे बनी थी सिपाही बहादुर सरकार
श्री गोहिया बताते हैं कि 1857 की क्रांति के दौरान सीहोर में महावीर कोठ और वली शाह के नेतृत्व में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सिपाही बहादुर सरकार की स्थापना की गई। दोनों भोपाल रियासत की उस फौज में सिपाही थे, जो अंग्रेज पॉलिटिकल एजेंट के नियंत्रण वाली रेजीमेंट में तैनात थी। इस फौज में करीब एक हजार सैनिक थे और हिंदू-मुसलमान सैनिक साथ रहते थे। अंग्रेजों और अंग्रेजपरस्त भोपाल नवाब के प्रति सैनिकों में बढ़ता असंतोष विद्रोह में बदल गया।
भगवा और हरे झंडे बने एकता के प्रतीक
सिपाही बहादुर सरकार के दो झंडे थे। एक निशाने महावीरी, जो भगवा रंग का था और दूसरा निशाने मोहम्मदी, जिसका रंग हरा था। ये दोनों झंडे उस दौर में हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बने। अंग्रेजी सत्ता के केंद्र के बिल्कुल करीब इस तरह की सरकार का गठन अपने आप में असाधारण घटना थी। 8 अगस्त 1857 को प्रशासन चलाने के लिए महावीरी काउंसिल बनाई गई, जिसका नेतृत्व महावीर कोठ ने किया। दो अदालतें भी गठित की गईं, जिनके प्रमुख वली शाह और महावीर कोठ थे।
हाथ से लिखे बुलेटिन बन गए आंदोलन की आवाज
विद्रोह को मजबूत करने और सैनिकों में संदेश पहुंचाने के लिए वली शाह प्रतिदिन हाथ से लिखे बुलेटिन जारी करते थे। ये बुलेटिन उस समय के अखबार की तरह काम करते थे। सैनिक इन्हें समूह बनाकर पढ़ते और आंदोलन से जुड़ी सूचनाएं एक-दूसरे तक पहुंचाते थे। अंग्रेजी सत्ता ने इस विद्रोह को दबाने के कई प्रयास किए, लेकिन तत्काल सफलता नहीं मिली।
137 बागियों को नौकरी से निकाला गया
विद्रोह को कुचलने के प्रयासों के बीच 1 सितंबर 1857 को बेगम भोपाल के आदेश पर सीहोर के 137 बागी सैनिकों को फौज की नौकरी से निकाल दिया गया। उन्हें भोपाल रियासत की सीमा से बाहर जाने का आदेश दिया गया। लेकिन आंदोलन की आग इतनी गहरी थी कि इससे विद्रोह की भावना खत्म नहीं हुई।
शुजाअत खां और बेटे सरफराज को सीहोर में फांसी
बैरसिया में विद्रोह के दौरान शुजाअत खां ने भी अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ मोर्चा संभाला। 26 सितंबर 1857 को भोपाल की फौज ने सूबेदार भवानी सिंह के नेतृत्व में बैरसिया पर हमला किया, जिसमें शुजाअत खां को पराजित होना पड़ा। वे कुरावर चले गए, लेकिन 29 अक्टूबर को गिरफ्तार कर लिए गए। 25 नवंबर को उन्हें कड़े पहरे में सीहोर लाया गया। यहां उनके पुत्र सरफराज खां के साथ जेल में बंद कर दिया गया। 4 जनवरी 1858 को दोनों पिता-पुत्र को सूर्योदय से पहले जेल से निकाला गया और ईदगाह के पास ले जाया गया। महुआ के पेड़ के नीचे दोनों को फांसी दे दी गई। बाद में दोनों को एक साथ दफना दिया गया। यह स्थान आज भी उस बलिदान की मौन गवाही देता है।
356 बागियों के खून से लाल हो उठी थी सीवन
इतिहास विज्ञ रघुवर दयाल गोहिया बताते हैं कि सीहोर जेल में भोपाल कॉन्टिनजेन्ट के अनेक बागी सिपाही कैद थे और उन्हें मौत की सजा सुनाई जा चुकी थी। 8 जनवरी 1858 को जनरल रोज अपनी सेना के साथ सीहोर पहुंचा। इसके बाद 14 जनवरी को सीवन नदी के किनारे मैदान में 356 बागी सिपाहियों को छोटी-छोटी टुकड़ियों में खड़ा कर गोलियों से भून दिया गया। इतिहास के इन पन्नों में दर्ज यह घटना सीहोर की सबसे दर्दनाक शहादतों में गिनी जाती है। कहा जाता है कि उस दिन बहा इतना खून कि सीवन नदी का पानी भी लाल हो गया था। इस घटना का उल्लेख हयाते सिकंदरी, भोपाल स्टेट गजेटियर 1907, 1857-58 के गदर में मध्य भारत के हालात और 15 जनवरी 1858 के देहली गजट सहित विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है।
महावीर कोठ और वली शाह को भी मिली फांसी
विद्रोह को समाप्त करने के लिए अंग्रेजी सत्ता और भोपाल रियासत ने कार्रवाई तेज कर दी। महावीर कोठ, वली शाह, फाजिल मोहम्मद सहित कई प्रमुख विद्रोहियों को गिरफ्तार किया गया और बाद में फांसी दी गई। 31 जनवरी 1858 को राहतगढ़ किले के दरवाजे पर फाजिल मोहम्मद खां को फांसी दिए जाने के साथ सीहोर में स्थापित सिपाही बहादुर सरकार का संघर्षपूर्ण अध्याय समाप्त हुआ।
आजादी के बाद भी सीहोर ने नहीं छोड़ी संघर्ष की राह
देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया, लेकिन भोपाल रियासत का भारतीय संघ में विलय अभी बाकी था। इस विलीनीकरण आंदोलन में भी सीहोर की धरती ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रुक्मणी देवी व्यास, धनेश्वरी देवी चतुर्वेदी और गिरजा बाई व्यास जैसी वीरांगनाओं ने आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई।
वीरांगनाओं ने निजामत भवन पर फहराया तिरंगा
13 जनवरी 1949 को श्रीमती धनेश्वरी देवी चतुर्वेदी और श्रीमती रुक्मणी देवी व्यास ने पुरानी निजामत की इमारत पर तिरंगा फहराकर अपने साहस का परिचय दिया। इसके बाद दोनों को 20-20 दिन तक नजरबंद रखा गया। यह घटना बताती है कि सीहोर की बेटियों ने भी स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक भारत के निर्माण के संघर्ष में पीछे कदम नहीं खींचे।
सीहोर की मिट्टी में आज भी जिंदा है बलिदान
सीहोर का इतिहास केवल तारीखों और घटनाओं का संग्रह नहीं है। यह उन हिंदू-मुस्लिम सैनिकों की एकता की कहानी है, जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी; उन पिता-पुत्रों की कहानी है, जिन्होंने फांसी का फंदा चूम लिया; उन 356 सिपाहियों की कहानी है, जिन्होंने मातृभूमि के लिए प्राण दिए और उन वीरांगनाओं की कहानी है, जिन्होंने तिरंगा हाथ में लेकर विलीनीकरण की लड़ाई लड़ी। 15 अगस्त पर जब तिरंगा सीहोर के आसमान में लहराता है, तब उसकी हर लहर मानो उन शहीदों को नमन करती है, जिन्होंने इस मिट्टी को अपने खून से सींचकर आने वाली पीढ़ियों के लिए आजादी की राह तैयार की।













