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तेज हेडलाइट का खतरा:28% सड़क हादसों के पीछे ‘सडन ब्लाइंडनेस’, नियमों की खुलकर हो रही अनदेखी

भोपाल के सूखी सेवनिया हाईवे पर हाल ही में हुए एक सड़क हादसे ने इस खतरे को फिर सामने ला दिया। रात करीब 10:30 बजे दो कारों की आमने-सामने टक्कर हो गई।
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28% सड़क हादसों के पीछे ‘सडन ब्लाइंडनेस’, नियमों की खुलकर हो रही अनदेखी
AI Generated Image

प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। शहर के सूखी सेवनिया हाईवे पर हाल ही में हुए एक सड़क हादसे ने इस खतरे को फिर सामने ला दिया। रात करीब 10:30 बजे दो कारों की आमने-सामने टक्कर हो गई। हादसे में घायल चालक ने बताया कि सामने वाली गाड़ी की तेज एक्स्ट्रा लाइट आंखों में पड़ते ही कुछ सेकेंड के लिए उसे कुछ दिखाई देना बंद हो गया और इसी वजह से टक्कर हो गई।

3 महीने में ढाई हजार से ज्यादा हादसे

यह कोई एक घटना नहीं है। 108 एंबुलेंस की जनवरी से मार्च 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में तीन महीनों में 20,965 सड़क हादसे हुए। इनमें से 9,313 हादसे शाम 6 बजे के बाद अंधेरे में हुए। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि करीब 28% घायलों ने माना कि हादसे की वजह सामने से आने वाले वाहन की तेज हेडलाइट थी जिससे कुछ सेकेंड के लिए आंखों के सामने अंधेरा छा गया। डॉक्टर इसे ‘टेम्परेरी सडन ब्लाइंडनेस’ कहते हैं।

नियम 60 वॉट का, इस्तेमाल 150 वॉट तक

वाहनों में हेडलाइट को लेकर स्पष्ट नियम हैं, लेकिन सड़कों पर इनकी जमकर अनदेखी हो रही है। कंपनियां 55 से 75 वॉट हेडलाइट देती हैं। लेकिन लोग 110 से 150 वॉट और एक्स्ट्रा लाइट लोग लगा रहे हैं। नियम 12 वोल्ट सिस्टम जिसमें अधिकतम 60/65 वॉट और  24 वोल्ट सिस्टम जिसमें अधिकतम 70/75 वॉट का है। इसके बावजूद कई वाहन चालकों द्वारा छत पर एक्स्ट्रा लाइट, हाई पावर LED और HID लाइट्स लगाई जा रही हैं जो सामने वाले के लिए खतरनाक साबित हो रही हैं।

    डॉक्टरों की चेतावनी: कुछ सेकेंड की अंधता बनती है जानलेवा

    नेत्र विशेषज्ञों के अनुसार तेज रोशनी आंखों पर सीधा असर डालती है।

    • 45 साल से ज्यादा उम्र में आंखों की संवेदनशीलता बढ़ जाती है
    • तेज रोशनी पड़ने पर 5 से 8 सेकेंड तक कुछ नहीं दिखता
    • अगर मोतियाबिंद या अन्य समस्या हो तो यह समय 20 से 60 सेकेंड तक भी हो सकता है

    डॉक्टरों का कहना है कि ड्राइविंग के दौरान यह स्थिति बेहद खतरनाक होती है क्योंकि कुछ सेकेंड की अंधता भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है।

    कैसे काम करती है ‘सडन ब्लाइंडनेस’

    तेज रोशनी आंखों के रेटिना में मौजूद कोन्स सेल्स को अचानक एक्टिव कर देती है। इससे विजिबिलिटी लगभग खत्म हो जाती है और ड्राइवर को सामने कुछ नजर नहीं आता। सामान्य व्यक्ति के लिए यह असर 2-3 सेकेंड तक रहता है लेकिन यही समय दुर्घटना के लिए काफी होता है।

    पुराने नियम हुए गायब, खतरा बढ़ा

    • पहले भारी वाहनों में हेडलाइट पर काली पट्टी होती थी, जिससे रोशनी नियंत्रित रहती थी
    • अब लोग हाई-इंटेंसिटी HID और LED लाइट्स लगा रहे हैं
    • शहरों में हाई बीम पर गाड़ी चलाना भी नियमों के खिलाफ है

    सख्त कार्रवाई का प्रावधान, फिर भी लापरवाही जारी

    ट्रैफिक नियमों के अनुसार पहली बार में ₹500 जुर्माना, दूसरी बार में ₹1500 और तीसरी बार में ड्राइविंग लाइसेंस रद्द करने का नियम है।आरटीओ अधिकारियों का कहना है कि हाई पावर लाइट, छत पर हैलोजन या तेज LED लाइट लगाना पूरी तरह नियम विरुद्ध है और इसके खिलाफ चालानी कार्रवाई की जा सकती है।

    कौन सी हेडलाइट कितनी खतरनाक

    ऑटो एक्सपर्ट्स के अनुसार अलग-अलग लाइट्स का असर:

    • हैलोजन: कम रोशनी, अपेक्षाकृत सुरक्षित
    • HID (जेनॉन): तेज सफेद रोशनी, आंखों में चुभती
    • LED: सही फिटिंग पर ठीक, गलत होने पर खतरनाक
    • लेजर: सबसे तेज और सबसे ज्यादा नुकसानदायक
    • प्रोजेक्टर: सही एलाइनमेंट पर सुरक्षित
    • DRL: दिन के लिए ठीक, रात में बेकार

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    बढ़ती लापरवाही, बढ़ता खतरा

    तेज हेडलाइट्स का यह ट्रेंड अब सड़क सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। नियमों के बावजूद लोग ज्यादा रोशनी को स्टाइल और विजिबिलिटी का साधन मान रहे हैं जबकि हकीकत में यह दूसरों की जान जोखिम में डाल रहा है। सड़क पर एक ड्राइवर की लापरवाही दूसरे की जिंदगी पर भारी पड़ सकती है। ऐसे में जरूरत है कि नियमों का सख्ती से पालन हो और जागरूकता भी बढ़े, ताकि सड़कों पर यह ‘अदृश्य खतरा’ कम किया जा सके।

    Sumit  Shrivastava
    By Sumit Shrivastava

    सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...Read More

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