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स्मृति शेष-बशीर बद्र :रिटायर्ड IAS अफसर ने बताया कहां मिलेंगे बड़े दिल वाले शायर बशीर बद्र के चरण चिह्न

मोहब्बत के शायर बशीर बद्र इस फानी दुनिया को अलविदा कह गए। इसके साथ ही कला जगत में शायरी का एक युग समाप्त हो गया। भोपाल को अपना घर बनाने वाले बशीर बद्र दुनियाभर के कद्रदानों के दिल में बसे। रिटायर्ड आईएएस मनोज श्रीवास्तव ने बताया कि वे बशीर साहब से मिलने के पहले से उनके फैन थे। श्रीवास्तव ने उन्हें याद करते हुए उनकी गजल की व्याख्या की और बताया कि उनके जैसे इंसान के निशां कहां-कहां मिलेंगे।   
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रिटायर्ड IAS अफसर ने बताया कहां मिलेंगे बड़े दिल वाले शायर बशीर बद्र के चरण चिह्न

भोपाल। रिटायर आईएएस मनोज श्रीवास्तव ने बशीर साहब को याद करते हुए लिखा कि वे हमारे भोपाल का गौरव तो वे थे ही पर उससे भी ज्यादा वे कविता का, शायरी का गौरव थे। मनोज श्रीवास्तव के शब्दों में ही जानिए बशीर बद्र को उनकी श्रद्धांजलि....

बुत भी रक्खे हैं नमाज़ें भी अदा होती हैं

दिल मिरा दिल नहीं अल्लाह का घर लगता है

बशीर बद्र चले गए। मैं अमेरिका में था पिछले एक महीने से। सो मेरा गीता पर धाराप्रवाह लेखन तो होता रहा पर बशीर जी के स्वास्थ्य के बारे में अपडेट नहीं ले पाया। 

कुछ बरसों पहले जब उनकी तबीयत बिगड़ी थी तब जरूर मैं उनके घर गया था।

हमारे भोपाल का गौरव तो वे थे ही पर उससे भी ज्यादा वे कविता का, शायरी का गौरव थे।

और मैं तो उनकी शायरी का शैदाई उनसे मिलने से भी पहले से था।

1987 में जब मैं मसूरी में परिवीक्षा पर था, मेरे बैचमेट आमिर सुभानी, जो बाद में बिहार के चीफ सेक्रेटरी बने, के साथ मेरी बशीर बद्र पर खूब चर्चा होती थी। सुभानी को लुभानी लगती थी जौन एलिया की शायरी, मुझे बशीर बद्र की।

मैं उनकी उस ग़ज़ल को दोहराता था:

सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है

बा-वज़ू हो के भी छूते हुए डर लगता है

मैं तिरे साथ सितारों से गुज़र सकता हूँ

कितना आसान मोहब्बत का सफ़र लगता है

मुझ में रहता है कोई दुश्मन-ए-जानी मेरा

ख़ुद से तन्हाई में मिलते हुए डर लगता है

बुत भी रक्खे हैं नमाज़ें भी अदा होती हैं

दिल मिरा दिल नहीं अल्लाह का घर लगता है

ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं

पांव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है

मुझे वह बहुत प्रिय लगती थी। कई कारणों से आज भी है। उसकी पहली ही पंक्ति -और दूसरी पंक्ति की भी - की ऐंद्रिकता मुझे आकर्षित करती थी पर उसका इस्तिआरा (रूपक) और तल्मीह ( संकेत) जैसे उस ऐंद्रिकता को एक रूहानी अनुभूति में बदलता था, उसने तो उस शेर को शब्दश: अद्भुत बना दिया था। वह प्रिया का शरीर था या स्वयं प्रेम था जो “गुलाबों का शजर” (वृक्ष ) बन गया था। बा-वज़ू (शुद्धि के साथ) इस्लामी तहारत (पवित्रता) का संदर्भ है, जो नमाज़ से पहले की शुद्धि को इंगित करता है। तो अपनी तरफ़ से तो उस सौंदर्य की पवित्रता का सम्मान करने की पूरी तैयारी कर ली है। पर स्पर्श में संकोच ही नहीं है, डर भी है। इस्लाम में जो ख़ौफ़-ए-ख़ुदा है वह क्या यही है?  इश्क़ की तमन्ना और अपनी अपर्याप्तता का वह द्वंद्व भी ग़ज़ब था।  इब्न अरबी को तब नया नया पढ़ा था तो  लगता था कि सृष्टि वुजूद (अस्तित्व) की अभिव्यक्ति है, पर स्पर्श में फ़ना (विलय) होने का डर लगता है। प्रेमी को प्रेमिका (या ख़ुदा) को छूते हुए ख़ौफ़ इस बात का है कि जो उसके होने की multiplicity है, वह अहद (एक) में विलीन हो जाएगी। और अल्लाह की कल्पना गुलाबों के शजर की तरह करने में उनकी कल्पना की नज़ाकत भी बहुत मुतअस्सिर करने वाली लगती थी। तो मुझे यह मिसरा मात्र प्रेम की शारीरिकता का नहीं लगता था, बल्कि वहदत-उल-वुजूद (अस्तित्व की एकता) की दार्शनिक गहराई को छूने वाला लगता था। इस मिसरे का मूल मज़मून वहदत-उल-वुजूद से जुड़ा था। इब्न अरबी की विचारधारा के अनुसार, सारा वजूद अल्लाह का ही तजल्ली (प्रकाशन) है। “गुलाबों का शजर” सृष्टि की सुंदरता है, पर “बा-वज़ू हो के भी डर” तौहीद की याद दिलाता है – बाहरी शुद्धि के बावजूद, नफ़्स (ego) का विलय डराता है।

भारी शब्दावली नहीं, दिल की भाषा का इस्तेमाल

ये थे बशीर। रोमांस और फिलॉसफी को सरल अल्फाज में पिरो देने वाले। भारी इस्तिलाहात (शब्दावली) की जगह दिल की भाषा इस्तेमाल करने वाले। इश्क़ को रूहानी ऊंचाई देने वाले। वाकई उनके साथ हम सितारों से गुजर जाते थे। वाकई उन्हें पढ़ते हुए मोहब्बत का सफर सरल लगता था।

और फिर तो बशीर महफिलों की जान हो गए थे। उनके शेर मुहावरों की तरह चल पड़े थे। उजाले अपनी यादों के वाला शेर तो इतना घिस गया था कि उससे चिढ़ सी ही हो गई थी। सो लोकप्रियता और लोकमान्यताओं का भारी सा दुनियावी कोलाहल था। बाहरी। राहत की बात थी कि बशीर अपने भीतर की कमियों के प्रति भी सजग थे :

मुझ में रहता है कोई दुश्मन-ए-जानी मेरा

ख़ुद से तन्हाई में मिलते हुए डर लगता है

यह जंग-ए-नफ़्स का शेर है। साधना में नफ़्स-ए-अम्मारा (निम्न आत्मा) दुश्मन है। तन्हाई में ख़ुद से मिलना मुहासिबा (आत्म-निरीक्षण) है, जो बक़ा (स्थायित्व) तक ले जाता है। अस्तित्ववादी दृष्टि में यह ख़ुद की घबराहट (angst) है, पर इस्लामी दर्शन में यह तौबा (पश्चाताप) का द्वार है। बशीर बद्र अपनी शायरी में तन्हाई और उदासी को ऐसी ही गहराई से छू लेते थे।

और इसीलिए उनकी पहचान भी संकुचित नहीं हो पाई। उसमें जिस तरह की सर्वस्वीकृति रही, वही उनका असली परिचय था। 

बुत भी रक्खे हैं नमाज़ें भी अदा होती हैं

दिल मिरा दिल नहीं अल्लाह का घर लगता है 

बुल्ले शाह और मंसूर हल्लाज और ग़ालिब के “बुत-ख़ाना” की परंपरा के शायर के रूप में इस तरह बशीर अपना स्थान बना गये। एक ऐसे समय में जब इस्लाम को एक exclusion की टर्म्स में पढ़ने- पढ़ाने की कोशिशें हो रही हैं, बशीर बद्र ने एक आदर्श भारतीय मुस्लिम के साहस के साथ स्वयं का ऐसा त'आरुफ़ कराया था। जिसका इतना विस्तार हो, वह यदि अंत में यह शिकायत भी करे तो वह सही लगती है :

ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं

पांव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है 

कल जब उन्हें कब्र में दफनाया गया होगा पता नहीं कितनों को फानी दुनिया की हक़ीक़त बताने वाला वह शे’र याद आया होगा। पांव फैलाने में सर दीवार से टकराना मक़ाम-ए-बंदगी का इशारा रहा था।

इतने broad-hearted शायर के चरण-चिन्ह हर उस जगह पर मिलेंगे जहां इन्सानियत का मान है।

वाकई बशीर बद्र जी ने पांव इतने फैलाये और दीवार में सिर लगने की सारी सीमाएँ वे तोड़ गए।

तभी तो फ़ना होना मानीखेज हुआ।

Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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