पल्लवी वाघेला, भोपाल। सोशल मीडिया पर धर्म गुरु और कथा वाचक अब बच्चों के रोल मॉडल बनकर सामने आ रहे हैं। आमतौर पर पहले बच्चों के लव एंगल, परिजन की डांट या पढ़ाई के डर के कारण घर छोड़ने के केस ही सामने आते थे, लेकिन अब कुछ ऐसे कारण भी सामने आ रहे हैं जो चौंकाने वाले हैं। इन्हीं में से एक है धार्मिक रील का प्रभाव। साल 2025 में प्रदेश में 42 ऐसे ही मामले सामने आए जिनमें बच्चों ने संत या कथावाचक की रील्स से प्रभावित होकर घर छोड़ने का मन बना लिया।
घर छोड़ने वाले 19 बच्चे मध्यप्रदेश के हैं तो वहीं 23 बच्चे दूसरे राज्यों के जिन्हें मप्र में रेस्क्यू कर उनके घर पहुंचाया गया। खास बात यह कि यह सभी बच्चे उच्च मध्यमवर्गीय परिवार से हैं और ज्यादातर में दोनों पैरेंट्स शासकीय या निजी नौकरी में है। वहीं, घर में आम पूजा-पाठ होती है, लेकिन धार्मिक कर्मकांड न के बराबर है।
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घर छोड़कर निकले बच्चों से बातचीत के आधार पर संत धीरेन्द्र शास्त्री, प्रेमानंद महाराज और अनिरूद्धाचार्य बच्चों में सबसे चर्चित हैं। इसके बाद जया किशोरी और पंडित प्रदीप मिश्रा हैं। पं. धीरेंद्रकृष्ण शास्त्री की रील्स देखकर भी बच्चे प्रभावित हैं। इनके अलावा दिल्ली से बाल संत अभिनव अरोरा और हिमाचल के भक्त भागवत की रील्स भी ट्रेंड में है।
भोपाल के 11 साल के बच्चे को बीते साल मई माह में बागेश्वर धाम जाने के पहले रेस्क्यू किया गया। बच्चे ने कहा कि वह भी बाबा की तरह ही देश-विदेश में घूम-घूम कर कथा करना चाहता है। उसने कहा कि वह बाबा के ऑरा से प्रभावित है, सनातन का ज्ञान सब तक पहुंचाना ही उसका लक्ष्य है।
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यूपी का एक 15 वर्षीय किशोर उज्जैन आने के लिए निकला था, जिसे भोपाल में रेस्क्यू किया गया। किशोर ने कहा कि वह महाकाल की नगरी जाने के बाद उनका आशीर्वाद लेकर बाल संत बनना चाहता है। उसे लगता था कि संत और कथावाचक लोगों के बीच खासे मशहूर हैं,
वहीं, इस साल मार्च माह में ही इंदौर के 13 वर्षीय बच्चे को पुलिस ने कड़ी मशक्कत के बाद रेस्क्यू किया। प्रेमानंद महाराज के उपदेशों से प्रभावित होकर बच्चे ने पिता के नाम पत्र लिखकर कहा कि वह अपने असली परिवार ईश्वर के पास जा रहा है और अब कभी नहीं लौटेगा। हालांकि, रेस्क्यू होने के बाद उसने माना कि उसने महाराज के उपदेशों का गलत अर्थ निकाला था और उसने बच्चों से अपील कर कहा कि ऐसे घर से न निकलें।
रेस्क्यू किए गए इन बच्चों के घर से निकलने का बड़ा कारण सोशल मीडिया का प्रभाव रहा है। दरअसल, जब बच्चे सोशल मीडिया के अधिक इंफ्लूएंस में आ जाते हैं तो इमोशनल, कम्युनिकेशन और सोशल इंटेलिजेंस काफी कम हो जाता है। वह अपनी आभासी दुनिया बनाकर जीने लगते हैं। बच्चे की ऑनलाइन एक्टिविटी और बिहेवियर में बदलाव पर नजर रखें।
डॉ. दीप्ति सिंघल, मनोवैज्ञानिक