प्रभा उपाध्याय, इंदौर। मप्र के धार, झाबुआ और आलीराजपुर में आदिवासियों के पारंपरिक भगोरिया उत्सव की धूम है। मांदल की थाप पर थिरकते युवा, आभूषणों से सजीं आदिवासी महिलाएं और युवतियां माहौल में रंगीनियत घोलती हैं। परंपराओं के बीच मुख्य बदलाव यह है कि चांदी महंगी होने से अब पारंपरिक भारी चांदी के आभूषणों की जगह फैशनेबल आर्टिफिशियल और हल्के आभूषणों का ट्रेंड चल पड़ा है। आदिवासी समाज में सोने से ज्यादा चांदी के गहनों को महत्व दिया जाता है। चांदी सामाजिक पहचान, वैवाहिक स्थिति और परंपरा का प्रतीक मानी जाती है। भगोरिया उत्सव में चांदी जैसी दिखने वाली हार, बिछिया, कड़े, पायजेब, झुमकों, बाजूबंध, कमरबंध सहित अन्य इमिटेशन ज्वेलरी की खूब बिक्री हो रही है।

आदिवासी समाज में महिलाएं पारंपरिक रूप से चार से पांच किलो वजन के करीज चांदी के गहने पहनती हैं। वर्तमान में चांदी की कीमत 2.75 लाख प्रति किलो तक पहुंच गया है। ऐसे में इसकी जगह इमिटेशन ज्वेलरी ने ले ली है।
पहले ग्राहक असली-नकली के बारे में पूछते थे, लेकिन इस बार ज्यादातर लोग सीधे इमिटेशन डिजाइन खरीद रहे हैं। पिछले साल की तुलना में करीब 30 से 40 प्रतिशत ज्यादा बिक्री हो रही है।
मोंटी सोनी, ज्वेलरी विक्रेता, वालपुर भगोरिया हाट, झाबुआ
चांदी बहुत महंगी हो गई है, इसलिए आर्टिफिशियल गहने ही ले रहे हैं। दिखने में भी अच्छे हैं और पता भी नहीं चलता है कि यह चांदी के नहीं है।
कमला बाई, वालपुर भगोरिया हाट
मां के पास चांदी की गहने हैं, लेकिन मुझे भी यह पहनना था, इसलिए आर्टिफिशियल चांदी की ज्वेलरी ली है। यह भागोरिया उत्सव और शादी दोनों में काम आते हैं।
पायल डामोर, वालपुर भगोरिया हाट में आई युवती