लोककला जगत को बड़ा झटका!पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन, रायपुर एम्स में ली अंतिम सांस

रायपुर। भारतीय लोककला की दुनिया से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई का निधन हो गया। उन्होंने शनिवार देर रात रायपुर के एम्स अस्पताल में अंतिम सांस ली। वे 72 वर्ष की थीं और पिछले कुछ समय से बीमार चल रही थीं।
उनके निधन की खबर मिलते ही पूरे छत्तीसगढ़ में शोक की लहर दौड़ गई। देश-विदेश के कलाकारों, साहित्यकारों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक नेताओं ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। हर कोई उन्हें भारतीय लोककला की एक ऐसी महान कलाकार बता रहा है, जिनकी कमी कभी पूरी नहीं हो सकेगी।
छत्तीसगढ़ की पहचान बनीं तीजन बाई
डॉ. तीजन बाई ने पंडवानी जैसी पारंपरिक लोककला को नई पहचान दिलाई। उन्होंने अपनी दमदार आवाज, शानदार अभिनय और अनोखी प्रस्तुति के दम पर महाभारत की कहानियों को मंच पर इस तरह जीवंत किया कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उन्होंने केवल भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। आज जब भी पंडवानी का नाम लिया जाता है, सबसे पहले डॉ. तीजन बाई का चेहरा लोगों के सामने आता है।
उन्होंने एशिया, यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कई अन्य देशों में पंडवानी की प्रस्तुतियां दीं।
गांव से शुरू हुआ सफर
डॉ. तीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में हुआ था। उनका बचपन साधारण परिवार में बीता। बचपन से ही उन्हें महाभारत की कहानियां सुनने का शौक था। उन्होंने अपने नाना से महाभारत की कथाएं और पंडवानी गायन सीखा। उस समय समाज में महिलाओं का पंडवानी गाना सामान्य बात नहीं थी। कई लोगों ने इसका विरोध भी किया, लेकिन तीजन बाई ने हार नहीं मानी।
उन्होंने समाज की पुरानी सोच को चुनौती दी और अपनी मेहनत व प्रतिभा के दम पर यह साबित कर दिया कि कला का कोई लिंग नहीं होता। उनकी सफलता ने आने वाली कई महिला कलाकारों के लिए भी नए रास्ते खोल दिए।
यह भी पढ़ें: James Burrows: 11 एमी अवॉर्ड विजेता और ‘Friends’ के मास्टरमांइड का निधन, 85 साल में दुनिया को कहा अलविदा
पंडवानी को दुनिया तक पहुंचाया
डॉ. तीजन बाई की सबसे बड़ी पहचान उनकी कापालिक शैली की प्रस्तुति थी। इस शैली में वे केवल गाती ही नहीं थीं, बल्कि अभिनय के जरिए महाभारत के पात्रों को मंच पर जीवंत कर देती थीं। उनके हाथ में तंबूरा होता था और उनकी आवाज में ऐसा जोश होता था कि दर्शक पूरी कहानी में खो जाते थे। उनके चेहरे के भाव, संवाद बोलने का अंदाज और अभिनय उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाता था।
उन्होंने एशिया, यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कई अन्य देशों में पंडवानी की प्रस्तुतियां दीं। जहां भी उन्होंने मंच संभाला, लोगों ने भारतीय लोककला की खूब सराहना की।
यह भी पढ़ें: पद्म भूषण डॉ. सुभाष कश्यप का निधन, 97 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस
देश के बड़े सम्मानों से हुईं सम्मानित
भारतीय लोककला में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें कई बड़े सम्मानों से सम्मानित किया। उन्हें वर्ष 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नृत्य शिरोमणि, कला शिरोमणि और कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले। कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद डॉक्टरेट यानी डी.लिट. की उपाधि भी प्रदान की।
उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया।
नई पीढ़ी को सिखाई लोककला
डॉ. तीजन बाई केवल एक कलाकार ही नहीं थीं, बल्कि एक बेहतरीन गुरु भी थीं। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा नई पीढ़ी को पंडवानी सिखाने में लगाया। उन्होंने कई युवाओं को प्रशिक्षण दिया ताकि यह लोककला आने वाले समय में भी जीवित रहे। उनका मानना था कि हमारी संस्कृति और परंपराओं को बचाने की जिम्मेदारी नई पीढ़ी की भी है। उनकी वजह से आज कई युवा कलाकार पंडवानी को आगे बढ़ा रहे हैं।
यह भी पढ़ें: फिल्म इंडस्ट्री में छाया मातम! मशहूर एक्टर-डायरेक्टर के. भाग्यराज का निधन, फैंस को लगा बड़ा झटका
लोककला जगत के लिए अपूरणीय क्षति
डॉ. तीजन बाई का निधन केवल छत्तीसगढ़ के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय लोककला जगत के लिए बड़ी क्षति माना जा रहा है। उनके निधन पर कला, साहित्य, राजनीति और समाज के कई लोगों ने श्रद्धांजलि दी है। सभी का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन को लोककला के लिए समर्पित कर दिया और अपनी कला के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक विरासत को पूरी दुनिया तक पहुंचाया।
उनके चेहरे के भाव, संवाद बोलने का अंदाज और अभिनय उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाता था।
हमेशा याद रहेंगी तीजन बाई
डॉ. तीजन बाई आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज, उनकी कला और उनकी प्रस्तुतियां हमेशा लोगों के दिलों में जीवित रहेंगी।











