Maharashtra Politics:उद्धव बनाम शिंदे की जंग में ओमराजे की एंट्री! क्यों बढ़ी दोनों खेमों में बेचैनी ?

शिवसेना में जारी खींचतान के बीच ऑपरेशन टाइगर की चर्चाएं लगातार तेज हो रही हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर अटकलें हैं कि कुछ सांसद पाला बदल सकते हैं। ऐसे में ओमराजे निंबालकर का फैसला सत्ता और संगठन दोनों के समीकरण बदलने की क्षमता रखता है।
ओमराजे निंबालकर पर टिकी दोनों गुटों की नजर
धाराशिव के सांसद ओमराजे निंबालकर इस समय महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल हो गए हैं। उद्धव ठाकरे गुट उन्हें अपने साथ बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, जबकि शिंदे गुट भी उनके समर्थन को महत्वपूर्ण मान रहा है। अब तक ओमराजे ने किसी भी पक्ष के समर्थन में स्पष्ट संकेत नहीं दिए हैं। इसी वजह से उनका रुख राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बना हुआ है।
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पवनराजे निंबालकर हत्याकांड का आया फैसला
ओमराजे निंबालकर के पिता और पूर्व कांग्रेस नेता पवनराजे निंबालकर हत्याकांड में हाल ही में अदालत का फैसला सामने आया। मुंबई की विशेष अदालत ने मामले में आरोपी सभी लोगों को बरी कर दिया। इस फैसले के बाद राजनीतिक माहौल और अधिक गर्म हो गया है। कई राजनीतिक विश्लेषक इसे मौजूदा घटनाक्रम से जोड़कर भी देख रहे हैं।
संजय राउत ने लगाए दबाव बनाने के आरोप
अदालती फैसले से पहले शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत ने गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया था कि ऑपरेशन टाइगर के तहत कुछ सांसदों और विधायकों पर दबाव बनाया जा रहा है। राउत ने पवनराजे निंबालकर हत्याकांड के फैसले का हवाला देते हुए सवाल उठाए थे। हालांकि इन आरोपों पर दूसरी ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
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शिवसेना की फूट के बाद बदले राजनीतिक समीकरण
साल 2022 में शिवसेना में हुई बड़ी टूट के बाद महाराष्ट्र की राजनीति पूरी तरह बदल गई थी। एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने और बाद में चुनाव आयोग ने उनके गुट को ही असली शिवसेना का दर्जा दिया। पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह भी शिंदे गुट को मिला। इसके बाद दोनों गुटों के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई लगातार जारी रही।
उद्धव गुट के 6 सांसद शिंदे की शिवसेना में शामिल हो सकते हैं
लोकसभा चुनाव 2024 में उद्धव ठाकरे गुट को 9 और शिंदे गुट को 7 सीटों पर जीत मिली थी। राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार यदि उद्धव गुट के कुछ सांसद शिंदे गुट में शामिल होते हैं, तो दलबदल विरोधी कानून के तहत जरूरी संख्या का दावा मजबूत हो सकता है। ऐसे में ओमराजे निंबालकर का फैसला केवल एक सांसद का निर्णय नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक समीकरण को प्रभावित करने वाला कदम माना जा रहा है।












