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लखनऊ। अपनी नवाबी खानपान संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है, जो इसे अद्वितीय स्वाद और खुशबू के कारण विश्वभर में मशहूर बनाता है। हाल ही में, यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइजेशन ने लखनऊ को उसकी समृद्ध पाक कला और खानपान के लिए "क्रिएटिव सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी" का दर्जा दिया है। यह भारत का तीसरा शहर है जिसे यह सम्मान मिला है; इससे पहले जयपुर को "क्रिएटिव सिटी ऑफ क्राफ्ट्स एंड फोक आर्ट" और वाराणसी को "क्रिएटिव सिटी ऑफ म्यूजिक" के रूप में मान्यता मिली थी। यूनेस्को की वेबसाइट के अनुसार, लखनऊ को यह उपाधि 118 वर्षों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पाक कला में किए गए नवाचारों के लिए प्रदान की गई है। लखनवी व्यंजन, जो नवाबों के समय से ही लोकप्रिय हैं, आज भी शहर की रसोई में मुगलई और अवधी स्वादों का बेहतरीन संगम प्रस्तुत करते हैं। लखनऊ की गलियों में कबाब, बिरयानी, कोरमा और शीरमाल जैसे व्यंजन मिलते हैं, जिनकी मोहक खुशबू हर भोजनप्रेमी को अपनी ओर आकर्षित करती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर अपनी खुशी व्यक्त करते हुए लिखा कि यूनेस्को ने लखनऊ की पाक कला को मान्यता दी है। उन्होंने लोगों से लखनऊ आकर इसकी अनूठी विशेषताओं को जानने का आग्रह किया। मोदी ने यह भी कहा कि यह सम्मान लखनऊ की पाक विरासत और भारत की समृद्ध भोजन परंपराओं में उसके योगदान को स्वीकार करता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने लखनवी खानपान की प्रशंसा की है, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी इसके बड़े प्रशंसक थे। उन्हें विशेष रूप से स्ट्रीट फूड पसंद था, जिसमें मलाई पान, ठंडाई, चाट और दूध की बर्फी शामिल थे। लखनऊ में रहते हुए, वे नियमित रूप से रामआसरे और राजा की ठंडाई का सेवन करते थे और मसालेदार सब्जी व पूड़ी का आनंद लेते थे।
केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने टिप्पणी की कि यह सम्मान लखनऊ के वैश्विक कद को बढ़ाता है और इसे स्वादों एवं संस्कृति के लिए एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल के रूप में स्थापित करता है।
यूनेस्को ने लखनवी खानपान को "क्रिएटिव सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी" घोषित किया है। लखनऊ का भोजन हमेशा से ही खास माना गया है।
दिल्ली दरबार के पतन के बाद, वहां के कलाकार और पाक विशेषज्ञ लखनऊ चले आए थे। उस दौर में दिल्ली के मुगलई खाने और लखनऊ के अवधी खाने के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा थी, जिसमें भोजन के तीन मुख्य गुणों: स्वाद, पौष्टिकता और खुशबू के आधार पर तुलना की जाती थी।
लखनऊ ने अपनी पाक कला में "दस्तरख्वान" नामक एक नया आयाम जोड़ा। दस्तरख्वान का अर्थ केवल भोजन करना नहीं, बल्कि मिल-जुलकर बातचीत और आनंद के साथ भोजन का अनुभव करना है। यह केवल स्वाद और सुगंध को ही नहीं, बल्कि दृश्य और श्रवण इंद्रियों को भी संतुष्ट करता है। यही कारण है कि लखनवी खानपान दिल्ली के मुगलई भोजन से अलग और विशिष्ट माना गया।
इतिहासकार डॉ. रवि भट्ट के अनुसार, मुगलई भोजन में तेज मसाले होते थे, जिससे पाचन में कठिनाई हो सकती थी। इसके विपरीत, अवधी और लखनवी व्यंजनों में हल्के मसाले और पारसी शैली का उपयोग होता था, जो स्वाद और पाचन दोनों के लिए बेहतर थे।