नर्मदा नदी में बढ़ते प्रदूषण को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त रुख दिखाया है। कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से साफ कहा गया कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो नर्मदा को बचाना बेहद मुश्किल हो जाएगा। शनिवार को हुई सुनवाई में चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने सभी पक्षों से इस मामले में जवाब मांगा है। कोर्ट ने कहा कि जो सुझाव दिए गए हैं, उन पर संबंधित विभाग अपनी स्थिति स्पष्ट करें। मामले की अगली सुनवाई 12 मई को तय की गई है।
इस पूरे मामले की शुरुआत एक चिट्ठी से हुई थी। लॉ स्टूडेंट समर्थ बघेल ने नालों के गंदे पानी से उगाई जा रही सब्जियों और नदी में गिरते सीवेज को लेकर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखा था। कोर्ट ने इस पत्र को गंभीरता से लेते हुए इसे जनहित याचिका में बदल दिया और सुनवाई शुरू की। इसके बाद इस मुद्दे से जुड़े और भी पक्ष सामने आए।
इस मामले में डेमोक्रेटिक लॉयर्स फोरम और अधिवक्ता विनीता आहूजा ने भी याचिका दाखिल की। उन्होंने नर्मदा में बढ़ते प्रदूषण और नालों से गुजरती पाइपलाइनों के जरिए गंदा पानी छोड़े जाने को चुनौती दी। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने सभी याचिकाकर्ताओं से कहा था कि वे सिर्फ समस्या न बताएं, बल्कि उसका हल भी सुझाएं। इसी के तहत इस बार याचिकाकर्ता की ओर से विस्तार से सुझाव पेश किए गए।
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सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता विनिता आहूजा की ओर से वकील आदित्य संघी ने डिवीजन बेंच को बताया कि प्रदूषण रोकने के लिए जरूरी सुझाव कोर्ट में जमा कर दिए गए हैं। वहीं डेमोक्रेटिक लॉयर्स फोरम की ओर से वकील रविंद्र गुप्ता ने कहा कि कुछ और रिपोर्ट्स आने के बाद वे भी अपने सुझाव पेश करेंगे।
याचिकाकर्ता की ओर से सबसे बड़ा सुझाव यह दिया गया कि नर्मदा में गिरने वाले गंदे नालों को पहले ही रोक दिया जाए। बताया गया कि बिना ट्रीटमेंट का सीवेज सीधे नदी में गिरना सबसे बड़ी समस्या है। इसके समाधान के तौर पर कहा गया कि नालों को नदी से 50 से 200 मीटर पहले ही इंटरसेप्ट कर उन्हें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट तक मोड़ दिया जाए। इससे पूरे शहर की सीवर व्यवस्था बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी, लेकिन प्रदूषण में बड़ा फर्क आ सकता है। यह भी बताया गया कि अगर सिर्फ कुछ बड़े नालों को नियंत्रित कर लिया जाए तो हालात काफी हद तक सुधर सकते हैं। इंदौर, सूरत और नागपुर जैसे शहरों में यह मॉडल पहले से काम कर रहा है।
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सुनवाई के दौरान घाटों की स्थिति को भी गंभीर बताया गया। कहा गया कि सफाई सिर्फ त्योहारों के समय होती है, जबकि रोजाना गंदगी बढ़ती रहती है। याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया कि घाटों पर नियमित सफाई के लिए ठेका दिया जाए और हर 20-30 मीटर पर डस्टबिन लगाए जाएं। साथ ही पानी में तैरते कचरे को हटाने के लिए मशीनों का इस्तेमाल और निगरानी के लिए वालंटियर तैनात किए जाएं। यह भी कहा गया कि इसे धार्मिक गतिविधि नहीं, बल्कि नगर निगम की नियमित जिम्मेदारी के रूप में देखा जाए।
सिर्फ सरकारी प्रयास ही काफी नहीं होंगे, बल्कि आम लोगों की सोच में भी बदलाव जरूरी है। नर्मदा में कचरा डालना अपराध है, इस तरह के संदेशों के साथ बड़े स्तर पर जनजागरूकता अभियान चलाने की जरूरत बताई गई। सुझाव में यह भी कहा गया कि स्वच्छ भारत मिशन जैसी योजनाओं से इसे जोड़कर लोगों को जागरूक किया जा सकता है, ताकि वे खुद भी नदी को साफ रखने में योगदान दें।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि होटल, उद्योग और घरों से गंदगी छोड़ने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए। इसके साथ ही मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी सक्रिय भूमिका निभाने की जरूरत बताई गई। नगर निकायों की जिम्मेदारी तय कर उनके खिलाफ भी कार्रवाई करने की बात कही गई। हाल ही में सामने आए एक वीडियो का जिक्र करते हुए बताया गया कि बड़ी मात्रा में दूध नदी में बहाया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार, इससे पानी में ऑक्सीजन की खपत बढ़ती है और जलीय जीवों को नुकसान होता है। इसका समाधान यह सुझाया गया कि घाटों पर कलेक्शन टैंक बनाए जाएं, जहां दूध या अन्य सामग्री जमा की जा सके और बाद में उसका सही उपयोग किया जा सके।
हाईकोर्ट ने सभी पक्षों से जवाब मांगा है और अब इस मामले की अगली सुनवाई 12 मई को होगी। माना जा रहा है कि उस दिन इन सुझावों पर विस्तार से चर्चा होगी और आगे की भूमिका तय की जाएगी।