पेरिस। नेपोलियन बोनापार्ट के 1809 के एक कोड वाले सैन्य संदेश जो 217 सालों तक पढ़ा नहीं जा सका था, AI ने 6 घंटे में ही पढ़ दिया। मैसेज को इसलिए नहीं पढ़ा जा सका क्योंकि उसकी साइफर की (डीकोड करने के साइन) खो गई थी। लाइव साइंस और द टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, एक AI इंजीनियर ने OpenAI के GPT-6 Astra का इस्तेमाल करके उस मैसेज को रिक्रिएट और डिकोड कर दिया है। इससे ऑस्ट्रिया के साथ नेपोलियन की जंग से ठीक पहले फ्रांसीसी और सहयोगी सेनाओं की पोजीशन के बारे में अहम जानकारी सामने आई है। यह सफलता साइबर सिक्योरिटी कंपनी SentinelOne के AI इंजीनियर कार्टर चर्च को मिली है। उन्होंने बताया कि AI ने इस समस्या को सुलझाने के लिए लगभग छह घंटे तक मॉडल चलाया। हालांकि छह घंटे के इस आंकड़े को संदर्भ में समझना जरूरी है।
AI की मदद इंजीनियर ने की
चर्च ने इस प्रोजेक्ट पर कई दिनों तक काम किया और AI को सिर्फ ऐतिहासिक दस्तावेज ही नहीं, बल्कि मौजूदा क्रिप्टोग्राफिक रिसर्च और ऐतिहासिक सामग्री भी फीड की थी। यह दस्तावेज मार्च 1809 का है, जब ऑस्ट्रिया नेपोलियन के फ्रांस के खिलाफ युद्ध की तैयारी कर रहा था। यह मैसेज जनरल ऑगस्टे डी मार्मोंट के लिए था। वे डेलमेटिया यानी आज के क्रोएशिया वाले इलाके में फ्रांसीसी सेना के साथ तैनात थे। नेपोलियन ने अपने सौतेले बेटे यूजीन डी ब्यूहरनिस ( उस समय इटली के वायसराय) को निर्देश दिया था कि वे मार्मोंट को फ्रांसीसी और सहयोगी सेनाओं की पोजीशन की जानकारी कोड के रूप में भेजें। नेपोलियन के 16 मार्च के निर्देशों में विशेष रूप से कहा गया था कि यह जानकारी किसी भरोसेमंद अधिकारी के जरिए साइफर में भेजी जाए।
फ्रेंच में सिर्फ एक लाइन लिखी थी
यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जो दस्तावेज मिला है, वह सामान्य फ्रांसीसी भाषा की एक लाइन से शुरू होता है और फिर रहस्यमय कोड में बदल जाता है। एन्क्रिप्टेड हिस्से में करीब 1,300 सिंबल या साइफर यूनिट हैं। यह नंबर, अक्षरों और बनाए गए निशानों से मिलकर बने हैं। रिसर्चर्स को इस दस्तावेज के बारे में दशकों से जानकारी थी, लेकिन इसकी असली की गायब थी।
पुरानी मैग्जीन से लिया फोटो
जो तस्वीर मौजूद थी, वह कोई नई खोजी गई पांडुलिपि नहीं थी। चर्च के अनुसार जो कॉपी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थी। दस्तावेज की कॉपी 1969 में एक फ्रांसीसी सैन्य-इतिहास पत्रिका में छपा कम रिजॉल्यूशन वाला स्कैन था। उस दस्तावेज में लगभग 155 अलग-अलग चिह्न थे, जिनमें कुछ अक्षरों के लिए एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल होने वाले कई चिह्न भी थे। इस तरह यह एक होमोफोनिक सब्स्टीट्यूशन साइफर (गूढ़लेखन या कूटलेखन) बन गया। चर्च को यह दस्तावेज तब मिला जब वह एक पुराने साइफर की तलाश कर रहे थे जिसका उपयोग आधुनिक AI सिस्टम की क्षमता को परखने के लिए किया जा सके।
ऐसे किया चिह्नों पर काम
AI इंजीनियर कार्टर चर्च ने GPT-6 Astra को वह तस्वीर दी और इस पर काम करने को कहा। मॉडल ने सबसे पहले उन असामान्य चिह्नों की पहचान कर उन्हें ट्रांसक्राइब किया। इसके बाद उसने ऐसे सुराग तलाशने शुरू किए जो उस दस्तावेज को पहले की क्रिप्टोग्राफिक रिसर्च से जोड़ सकें। यह कदम बहुत अहम साबित हुआ।
पुराने 33 कोड मिले जिनकी मदद से किया डीकोड
अपनी रिसर्च के दौरान Astra को क्रिप्टोलॉजी इतिहासकार डैनियल टैंट द्वारा तैयार की गई एक अधूरी साइफर टेबल मिली। उस टेबल में 33 चिह्नों के अर्थ बताए गए थे, जो कोडेड हिस्से का लगभग एक तिहाई हिस्सा थे। चर्च ने कहा कि उस टेबल को पहले कभी उस विशेष दस्तावेज से नहीं जोड़ा गया था। AI ने उस संभावित कनेक्शन को पहचाना और बची हुई साइफर पर उस अधूरी की को लागू कर दिया। इसके बाद सिस्टम ने बाकी बचे चिह्नों को समझने के लिए ऐतिहासिक जानकारी, भाषा के पैटर्न और कंप्यूटेशनल ट्रायल एंड एरर के तरीके का इस्तेमाल किया। रिपोर्टों के मुताबिक इस प्रक्रिया में सिमुलेटेड एनीलिंग तकनीक (ऐसा तरीका जिससे समस्या का सबसे संभावित समाधान खोजा जाता है) शामिल थी। यह एक कंप्यूटेशनल तकनीक है जो कई संभावित समाधानों को परखती है और ऐसे कॉम्बिनेशन खोजती है जिनसे सबसे ज्यादा सटीक और स्पष्ट परिणाम मिल सकें।
मैसेज में फ्रांसीसी सेनाओं की जानकारी थी
डिकोड किए गए मैसेज में दरअसल एक मिलिट्री ब्रीफिंग थी। इसमें फ्रांसीसी और सहयोगी सेनाओं की पोजीशन और ताकत की जानकारी दी गई थी। साथ ही ऑस्ट्रिया के खिलाफ आगे बढ़ रही रूसी सेनाओं के बारे में भी बताया गया था। संदेश में मार्मोंट को मौजूदा सैन्य हालात को लेकर आश्वस्त करने की कोशिश की गई थी और उन्हें निर्देश दिया गया था कि जब आगे बढ़ने का आदेश मिले तो वे दुश्मन सेनाओं से घबराएं नहीं।