पश्चिम बंगाल से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। देश के संविधान को अपनी कला से सजाने वाले कलाकार नंदलाल बोस के परिवार को ही इस बार सिस्टम की चूक का सामना करना पड़ा है। शांतिनिकेतन में रहने वाले उनके पोते सुप्रबुद्ध सेन और उनकी पत्नी दीपा सेन का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है। हैरानी की बात यह है कि दोनों ने सभी जरूरी दस्तावेज समय पर जमा किए थे और चुनाव अधिकारियों के सामने पेश भी हुए थे। इसके बावजूद उनका नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं किया गया। यह घटना ऐसे समय पर सामने आई है, जब राज्य में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर पहले से ही विवाद चल रहा है।
शांतिनिकेतन में रहने वाले 88 वर्षीय सुप्रबुद्ध सेन और उनकी 82 वर्षीय पत्नी दीपा सेन ने आरोप लगाया है कि उन्हें उनके मताधिकार से वंचित कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि शुरुआत में उनका नाम पेंडिंग श्रेणी में रखा गया था। इसके बाद उन्होंने चुनाव अधिकारियों के समक्ष उपस्थित होकर सभी आवश्यक दस्तावेज जमा किए। अधिकारियों ने उनके घर आकर भी सत्यापन किया लेकिन इसके बावजूद उनका नाम अंतिम सूची से गायब हो गया। इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इतनी बड़ी प्रशासनिक चूक कैसे हो सकती है।
सुप्रबुद्ध सेन के अनुसार उन्होंने पहचान और निवास के सभी प्रमाण दिए थे। इनमें पासपोर्ट, पेंशन रिकॉर्ड, शैक्षणिक प्रमाण पत्र और अन्य जरूरी दस्तावेज शामिल थे। इतना ही नहीं, अधिकारियों ने उनके घर आकर भी जानकारी जुटाई थी। इसके बावजूद उनका नाम सूची से हट जाना यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं प्रक्रिया में गंभीर खामी है। उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्हें इस फैसले के पीछे कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है, जो स्थिति को और अधिक चिंताजनक बनाता है।
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इस मामले में केवल सुप्रबुद्ध सेन और उनकी पत्नी ही नहीं, बल्कि उनके साथ पिछले 52 वर्षों से रह रहे चक्रधर नायक का नाम भी मतदाता सूची में शामिल नहीं है। यह दर्शाता है कि यह कोई एकल मामला नहीं, बल्कि एक व्यापक समस्या का हिस्सा हो सकता है। सुप्रबुद्ध सेन ने यहां तक कह दिया कि अब उन्हें वोट नहीं डालने का कोई अफसोस नहीं है क्योंकि वे अपने जीवन में कई बार मताधिकार का उपयोग कर चुके हैं।
सुप्रबुद्ध सेन, नंदलाल बोस की छोटी बेटी जमुना सेन के पुत्र हैं। उनका पालन-पोषण अपने दादा के संरक्षण में हुआ। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा विश्व-भारती विश्वविद्यालय के पाठ भवन से पूरी की और आगे की पढ़ाई भी वहीं से की। बाद में उन्होंने जादवपुर विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। करियर के तौर पर उन्होंने दामोदर वैली कॉर्पोरेशन में करीब 32 वर्षों तक सेवा दी और 1996 में सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद वे स्थायी रूप से शांतिनिकेतन में बस गए।
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पश्चिम बंगाल में इन दिनों मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर पहले से ही विवाद चल रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार अब तक कई सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी की जा चुकी हैं, जिनमें लाखों नामों की जांच की गई है। बताया जा रहा है कि बड़ी संख्या में नाम सूची से हटाए गए हैं, जिससे आम लोगों के बीच असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। ऐसे में नंदलाल बोस के परिवार का यह मामला और भी ज्यादा चर्चा में आ गया है, क्योंकि यह एक प्रतिष्ठित परिवार से जुड़ा हुआ है।
इस मामले पर स्थानीय प्रशासन की ओर से फिलहाल स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया है। श्रीनिकेतन की बीडीओ अर्पिता चौधरी ने कहा है कि नाम हटने के कारणों की जांच की जा रही है और प्रभावित लोग ट्रिब्यूनल में अपील कर सकते हैं।
हालांकि, यह जवाब लोगों की चिंता को पूरी तरह शांत नहीं कर पा रहा है, क्योंकि सवाल यह है कि आखिर ऐसी गलती हुई ही क्यों।
नंदलाल बोस भारतीय कला जगत के एक प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। वे रवींद्रनाथ टैगोर के शिष्य थे और उन्होंने अपनी कला से भारतीय संस्कृति को नई पहचान दी। सबसे महत्वपूर्ण योगदान उनका भारतीय संविधान की मूल प्रति को सजाने में रहा। यह जिम्मेदारी उन्हें जवाहरलाल नेहरू द्वारा सौंपी गई थी। उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर संविधान की पांडुलिपि को चित्रों से सजाया, जो आज भी भारतीय विरासत का अनमोल हिस्सा है।