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नहीं थम रहा मौत का तांडव 18वीं मौत के बाद भी जिम्मेदारों की नहीं खुल रही नींद!

18वीं मौत के बाद भी जिम्मेदारों की नहीं खुल रही नींद!
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    इंदौर। शहर में दूषित पानी से फैल रही बीमारी अब खुलकर जानलेवा बन चुकी है, लेकिन इसके बावजूद शासन-प्रशासन हकीकत स्वीकारने को तैयार नहीं है। मंगलवार को कुलकर्णी नगर में एक बुजुर्ग महिला की मौत के बाद मौतों का आंकड़ा बढ़कर 18 तक पहुंच गया, लेकिन प्रशासन अब भी इस मौत को दूषित पानी से जोड़ने से बचता नजर आ रहा है। परिजनों के आरोप, मरीजों की बढ़ती संख्या और लगातार हो रही मौतें भी जिम्मेदारों की नींद नहीं खोल पा रही हैं।

    मृतका 80 वर्षीय हरकुंवर ग्रैरईया  कुलकर्णी नगर की निवासी थीं, लेकिन बीते दिनों वे भागीरथपुरा में रहने वाली अपनी बेटी के घर ठहरी हुई थीं। परिजनों के मुताबिक, यहीं उन्होंने दूषित पानी का सेवन किया, जिसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ती चली गई। उल्टी-दस्त की गंभीर शिकायत के बाद इलाज भी कारगर नहीं रहा और 2 जनवरी को उनकी मौत हो गई। परिजन साफ शब्दों में इसे डायरिया और दूषित पानी से हुई मौत बता रहे हैं।

    हरकुंवर की बेटी निर्मला ने बताया कि मां 20 दिसंबर से उनके घर आई हुई थीं और करीब दस दिन तक वहीं रहीं। 30 दिसंबर को अचानक उल्टी-दस्त शुरू हो गए। डॉक्टर को दिखाया गया, दवाइयां भी दी गईं, लेकिन सुधार नहीं हुआ। हालत बिगड़ने पर 1 जनवरी को मां को कुलकर्णी नगर में रहने वाले भाई के घर भेजा गया, जहां अगले ही दिन उनकी तबीयत फिर गंभीर हो गई और मौत हो गई। निर्मला का कहना है कि उनके परिवार के चार अन्य सदस्य भी बीमार पड़े हैं, जिनमें से एक को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है।

    इसके बावजूद प्रशासन का रुख पूरी तरह से सवालों के घेरे में है। अधिकारियों का कहना है कि जिसकी “हिस्ट्री” उन्हें भागीरथपुरा की मिलेगी, उसी मौत को दूषित पानी से जोड़कर देखा जाएगा। सवाल यह है कि क्या बीमारी इलाके की सीमा देखकर फैलती है? क्या दूषित पानी किसी एक कॉलोनी की दीवार पर रुक जाता है? प्रशासन की यह दलील अब आम जनता के गले नहीं उतर रही।

    आरोप है कि अपनी जिम्मेदारी से बचने और जनता के बीच भरोसा दिखाने के लिए प्रशासन सिर्फ दिखावटी कवायद में जुटा है। रोज सुबह से शाम तक सैकड़ों पानी के टैंकर, डॉक्टरों की टीमें और नगर निगम के कर्मचारी भागीरथपुरा क्षेत्र में घूमते जरूर नजर आते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। प्रशासनिक फाइलों में मौतों की संख्या कम दिखाई जा रही है, जबकि वास्तविकता कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

    सबसे चौंकाने वाली और गंभीर बात यह है कि अब तक एक भी शव का पोस्टमार्टम प्रशासन द्वारा नहीं कराया गया। पीएम न होने से मौत के वास्तविक कारणों पर हमेशा के लिए पर्दा डालने की आशंका गहराती जा रही है। सवाल साफ है। अगर मौतों की सच्चाई सामने आ गई, तो जिम्मेदारी तय होगी, और शायद इसी डर से प्रशासन सच्चाई से भागता नजर आ रहा है।

    दूषित पानी से फैली यह त्रासदी अब सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि प्रशासनिक असंवेदनशीलता और लापरवाही का प्रतीक बन चुकी है। जब लोग एक-एक कर मर रहे हों और जिम्मेदार अब भी कारण मानने से इनकार करें, तो यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर जनता की जान की कीमत क्या सिर्फ आंकड़ों तक ही सीमित रह गई है?

     

    Hemant Nagle
    By Hemant Nagle

    हेमंत नागले | पिछले बीस वर्षों से अधिक समय से सक्रिय पत्रकारिता में हैं। वर्ष 2004 में मास्टर ऑफ जर्...

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