ग्वालियर। प्रदेश में निगम और मंडलों में होने वाली नियुक्तियां फिलहाल सियासी खींचतान के चलते अटकी हुई बताई जा रही हैं। जानकारों के मुताबिक केपी यादव और ब्रजेन्द्र यादव को लेकर सत्ता और संगठन के भीतर अलग-अलग खेमों की रणनीति के कारण मामला उलझ गया है। बताया जा रहा है कि विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर पूर्व सांसद केपी यादव को किसी अहम पद पर नियुक्त करवाने के पक्ष में हैं। वहीं केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिए मुगावली विधायक ब्रजेन्द्र यादव को मंत्री बनाने की पैरवी कर रहे हैं। दोनों पक्षों के रुख के चलते निगम-मंडल नियुक्तियों का मामला आगे नहीं बढ़ पा रहा है।
प्रदेश में भाजपा संगठन के चुनाव के बाद भी सरकार और संगठन में बैठे नेता जमीनी कार्यकर्ताओं को पद देने के मामले में सक्रिय नजर नहीं आ रहे हैं। बताया जाता है कि पार्टी के कई नेता और कार्यकर्ता लंबे समय से निगम-मंडलों में नियुक्तियों की उम्मीद लगाए बैठे हैं लेकिन अभी तक कोई फैसला नहीं हो सका है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में भी कई निगम-मंडलों में नियुक्तियां लंबित रह गई थी। अब मौजूदा सरकार में भी करीब ढ़ाई साल बीतने के बाद कई संस्थानों में अभी तक अधिकारियों के भरोसे ही काम चल रहा है। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ती जा रही है।
सूत्रों का कहना है कि गुना की राजनीतिक स्थिति को संतुलित करने के लिए केपी यादव को तवज्जो देने की चर्चा है। वहीं इसके संतुलन के रूप में ब्रजेन्द्र यादव को मंत्री बनाए जाने की मांग उठाई जा रही है। इस मांग को लेकर प्रदेश स्तर पर लिखित आश्वासन की बात सामने आने से मामला और उलझ गया है।
पार्टी के कई नेता और कार्यकर्ता लंबे समय से नियुक्तियों का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन गुटबाजी और खेमेबाजी के कारण फैसला नहीं हो पाने से उनमें नाराजगी बढ़ती जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि जल्द ही नियुक्तियों पर फैसला नहीं हुआ तो इसका असर पार्टी के अंदरूनी माहौल पर भी पड़ सकता है।
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साल 2020 में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों को कुछ अहम पद दिए गए थे। उस समय पूर्व विधायक मुन्नालाल गोयल को बीज विकास निगम का अध्यक्ष और पूर्व मंत्री इमरती देवी को लघु उद्योग निगम का अध्यक्ष बनाया गया था। हालांकि ग्वालियर अंचल के अन्य नेताओं को उस दौर में ज्यादा तवज्जो नहीं मिली थी।