Peoples Update Special :मध्य प्रदेश में 40 लाख मीट्रिक टन धान की मिलिंग अटकी, ₹95,560 करोड़ का अनाज गोदामों में फंसा; केंद्र से समय बढ़ाने की मांग

अशोक गौतम, भोपाल। मध्य प्रदेश में समर्थन मूल्य पर खरीदी गई धान की मिलिंग समय पर नहीं होने से सरकार के सामने बड़ा वित्तीय और भंडारण संकट खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार द्वारा तय 30 जून की अंतिम समय-सीमा समाप्त होने के बावजूद प्रदेश में करीब 40 लाख मीट्रिक टन धान अब भी गोदामों में पड़ी हुई है। समर्थन मूल्य 2,389 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से इस धान की अनुमानित कीमत करीब 95,560 करोड़ रुपए आंकी जा रही है। राज्य सरकार ने समय-सीमा बढ़ाने के लिए करीब दो महीने पहले केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा था लेकिन अब तक इस पर कोई निर्णय नहीं हुआ है।
केवल 24% की ही हुई मिलिंग
वर्ष 2025-26 में मध्य प्रदेश सरकार ने किसानों से समर्थन मूल्य पर 51 लाख मीट्रिक टन से अधिक धान खरीदी थी। इसके मुकाबले अब तक केवल करीब 24 प्रतिशत धान की मिलिंग हो सकी है जबकि शेष लगभग 40 लाख मीट्रिक टन धान अभी भी विभिन्न गोदामों में भंडारित है।
अपग्रेडेशन राशि बंद होने से बढ़ा विवाद
धान मिलिंग में देरी की सबसे बड़ी वजह सरकार और राइस मिलर्स के बीच भुगतान को लेकर बना विवाद माना जा रहा है। पिछले वर्ष तक सरकार मिलिंग के लिए 100 रुपए प्रति क्विंटल का भुगतान करती थी जिसमें 40 रुपए प्रति क्विंटल अपग्रेडेशन राशि भी शामिल थी। इस वर्ष सरकार ने यह अतिरिक्त राशि बंद कर दी है और अब केवल 60 रुपए प्रति क्विंटल का भुगतान किया जा रहा है।
3 साल तक मिल चुकी है सहायता
सरकार का कहना है कि राइस मिलरों को मशीनों के आधुनिकीकरण के लिए लगातार तीन वर्षों तक अपग्रेडेशन राशि दी जा चुकी है। इसलिए अब अलग से यह राशि देने की आवश्यकता नहीं है। वहीं राइस मिलर्स का कहना है कि मौजूदा भुगतान दर पर मिलिंग करना आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं है। इसी कारण कई मिलरों ने मिलिंग की गति धीमी कर दी है जबकि कुछ ने काम पूरी तरह रोक दिया है।
हर महीने 12 से 15 करोड़ रुपए का गोदाम किराया
सरकार द्वारा खरीदी गई बड़ी मात्रा में धान को निजी वेयरहाउसों में भी रखा गया है। इसके कारण सरकार को हर महीने करीब 12 से 15 करोड़ रुपए गोदाम किराये के रूप में खर्च करने पड़ रहे हैं। जब तक मिलिंग पूरी नहीं होगी यह अतिरिक्त आर्थिक बोझ लगातार बढ़ता रहेगा।
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भावांतर मॉडल पर कर रही सरकार विचार
धान खरीदी, परिवहन, भंडारण और मिलिंग पर आने वाले भारी खर्च को कम करने के लिए राज्य सरकार अब भावांतर आधारित व्यवस्था लागू करने पर विचार कर रही है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार किसानों को अपनी उपज खरीदी केंद्र तक लाने की जरूरत नहीं होगी। वे बाजार में ही धान बेच सकेंगे और बाजार मूल्य तथा समर्थन मूल्य के बीच का अंतर सरकार खसरा-खतौनी के आधार पर सीधे किसानों के बैंक खातों में जमा करेगी। इससे सरकारी खरीद, भंडारण और मिलिंग पर होने वाला खर्च काफी कम होने की संभावना है।
इस वर्ष धान की मिलिंग कम हुई
खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग की अपर मुख्य सचिव (ACS) रश्मि अरुण शमी ने कहा इस वर्ष धान की मिलिंग कम हुई है। जून तक मिलिंग पूरी होना थी लेकिन कुछ मिलर काम नहीं कर रहे हैं। इसी कारण मिलिंग प्रभावित हुई है। धान मिलिंग की समय-सीमा बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है।
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राइस मिलर राकेश भटेरे ने उठाए सवाल
बालाघाट के राइस मिलर राकेश भटेरे का कहना है कि सरकार की मिलिंग कराने में पर्याप्त रुचि नहीं दिख रही है। उन्होंने कहा सरकार 40 रुपए प्रति क्विंटल अपग्रेडेशन राशि देना नहीं चाहती जबकि 22 रुपए प्रति क्विंटल की दर से चावल एथेनॉल कंपनियों को बेचा जा रहा है। यदि अपग्रेडेशन राशि नहीं देनी है तो पहले धान की गुणवत्ता की टेस्टिंग कराई जाए जिससे यह स्पष्ट हो सके कि प्रति क्विंटल धान से कितना चावल निकलता है। फिलहाल धान मिलिंग की तय समय-सीमा भी समाप्त हो चुकी है।












