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90 दिन की जगह 720 दिन क्यों?विधायक निर्मला सप्रे अयोग्यता मामले में हाईकोर्ट सख्त

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच ने सागर जिले की बीना से विधायक निर्मला सप्रे की अयोग्यता से जुड़े मामले में सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी की है।
विधायक निर्मला सप्रे अयोग्यता मामले में हाईकोर्ट सख्त

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच ने सागर जिले की बीना से विधायक निर्मला सप्रे की अयोग्यता से जुड़े मामले में सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा कि जब कानून में इस तरह के मामलों के निपटारे के लिए 90 दिन की समयसीमा तय है तो फिर इस केस में 720 दिन कैसे बीत गए। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच जिसमें चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस हाईकोर्ट शामिल थे, ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि अगर विधानसभा स्पीकर को लगता है कि मामले में कोई दम नहीं है तो उसे खारिज क्यों नहीं किया जा रहा।

स्पीकर को सुप्रीम कोर्ट की समयसीमा बताने के निर्देश

हाईकोर्ट ने राज्य के महाधिवक्ता प्रशान्त सिंह को निर्देश दिए कि वे विधानसभा स्पीकर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई समयसीमा से अवगत कराएं। कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि इतनी लंबी देरी न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ है और इस पर जवाबदेही तय होना जरूरी है।

क्या है पूरा मामला

दरअसल नेता प्रतिपक्ष की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि निर्मला सप्रे ने बीना सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता था लेकिन बाद में वे भाजपा में शामिल हो गईं। इसके बाद जून 2024 में उन्हें अयोग्य घोषित करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष को आवेदन दिया गया था। नियमों के मुताबिक इस तरह के आवेदन का निपटारा 90 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए था लेकिन तय समयसीमा बीत जाने के बावजूद कोई फैसला नहीं लिया गया। इसी देरी के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।

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सुनवाई में क्या हुआ

बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विभोर खंडेलवाल और जयेश ज्ञानानी पेश हुए जबकि राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशान्त सिंह ने पक्ष रखा। महाधिवक्ता ने अदालत को बताया कि 22 अप्रैल को याचिकाकर्ता ने कुछ नए सबूत और गवाह प्रस्तुत किए हैं जिनका परीक्षण अभी बाकी है। उन्होंने यह भी कहा कि स्पीकर इस मामले की सुनवाई अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया के तहत कर रहे हैं इसलिए सभी तथ्यों पर विचार करना जरूरी है और इसी कारण देरी हो रही है।

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कोर्ट का साफ संदेश

हाईकोर्ट की टिप्पणियों से यह साफ हो गया है कि न्यायालय इस मामले में हो रही देरी से संतुष्ट नहीं है। कोर्ट ने यह संकेत दिया कि या तो समयसीमा के भीतर निर्णय लिया जाए या फिर यदि मामला मजबूत नहीं है तो उसे खारिज कर दिया जाए।

Dr. Sumit  Shrivastava
By Dr. Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...

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