श्योपुर:मदर्स डे पर कूनो की चीता माताओं पर बनी शॉर्ट फिल्म रिलीज, भारत में चीतों का कुनबा बढ़कर हुआ 57

श्योपुर। नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से आईं मादा चीतों ने भारत में सफलतापूर्वक शावकों को जन्म दिया। भारत में जन्मी मादा चीतों ने भी प्रजनन कर नई पीढ़ी को आगे बढ़ाया। कुल 49 शावकों में से 37 पूरी तरह स्वस्थ और सुरक्षित हैं।
चीता माताओं के संघर्ष की कहानी
मदर्स डे के खास अवसर पर जारी इस शॉर्ट फिल्म में चीता माताओं के संघर्ष और उनके मातृत्व को दिखाया गया है। इसमें बताया गया है कि कैसे मादा चीतों ने नए माहौल में खुद को ढाला। भारतीय जंगलों में जीवन आसान नहीं था, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। इन चीतों ने अपने शावकों को सुरक्षित रखने के लिए लगातार संघर्ष किया। फिल्म में उनके धैर्य और साहस को प्रमुखता से दर्शाया गया है। यही वजह है कि आज चीतों की संख्या बढ़ती नजर आ रही है।
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विदेश से आईं मादा चीतों की अहम भूमिका
नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाई गई 6 मादा चीतों में से 5 ने भारत में शावकों को जन्म दिया। यह इस परियोजना की बड़ी सफलता मानी जा रही है। इन चीतों ने न केवल नए वातावरण को अपनाया बल्कि यहां प्रजनन भी किया। इससे यह साबित हुआ कि भारत का इकोसिस्टम उनके लिए अनुकूल बन रहा है। इन मादा चीतों की वजह से भारत में चीतों की नई पीढ़ी की शुरुआत हुई। उनका योगदान इस पूरे अभियान की रीढ़ बनकर सामने आया है।
बीते 3 साल में 49 शावकों का जन्म
पिछले साढ़े तीन साल में कुल 49 शावकों का जन्म हुआ है, जिनमें से 37 पूरी तरह स्वस्थ और सुरक्षित हैं। यह आंकड़ा चीतों के भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत दे रहा है। कूनो और आसपास के करीब 5 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में इनकी मौजूदगी दर्ज की गई है। इसमें श्योपुर, ग्वालियर, मुरैना और राजस्थान के कुछ हिस्से शामिल हैं। फिलहाल 15 चीते खुले जंगल में स्वतंत्र रूप से मूवमेंट कर रहे हैं। यह दिखाता है कि अब वे प्राकृतिक जीवन के साथ तालमेल बैठा रहे हैं।
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अब नए इलाकों में चीते बसाने की तैयारी
फिल्म में यह भी बताया गया कि अलग-अलग देशों से लाए गए चीतों के कारण आनुवंशिक विविधता मजबूत हुई है। इससे इनब्रीडिंग का खतरा काफी हद तक कम हो गया है। दूसरी पीढ़ी यानी एफ-2 जेनरेशन के शावकों का जन्म इस बात का संकेत है कि चीतों की आबादी अब आत्मनिर्भर बन रही है। कूनो प्रबंधन अब नए क्षेत्रों में भी चीतों को बसाने की तैयारी कर रहा है। इस सफलता के पीछे फील्ड स्टाफ, डॉक्टरों और वन अधिकारियों की मेहनत को भी सराहा गया है।












