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ममता का 'No इस्तीफा'बयान : लेकिन सीएम कुर्सी की लाइफलाइन सिर्फ कल तक! संविधान क्या कहता है ?

ममता बनर्जी के इस्तीफा न देने के बयान के बाद पश्चिम बंगाल में संवैधानिक बहस तेज है। क्या विधानसभा का कार्यकाल खत्म होते ही मुख्यमंत्री का पद अपने आप समाप्त हो जाता है? राज्यपाल की भूमिका क्या होती है और एक्सपर्ट क्या कहते हैं- समझिए पूरा मामला
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लेकिन सीएम कुर्सी की लाइफलाइन सिर्फ कल तक! संविधान क्या कहता है ?

पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों के बाद सियासत अपने चरम पर है और इसकी वजह बनी हैं ममता बनर्जी। चुनाव में हार के बाद भी उनका आक्रामक तेवर कम नहीं हुआ है। उन्होंने ने सिर्फ चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए, बल्कि यह तक कहा कि मैं हारी नहीं हूं, मुझे हराया गया है। इसके साथ ही उनका एक और बयान सबसे ज्यादा चर्चा में है जिसमें उन्होंने कहा कि वह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देंगी। इस बयान ने राज्य में संवैधानिक स्थिति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। लोग जानना चाहते हैं कि अगर कोई मुख्यमंत्री इस्तीफा देने से इनकार कर दे तो क्या वह पद पर बना रह सकता है? 

मैं हारी नहीं, मुझे हराया गया- ममता बनर्जी

मंगलवार शाम को ममता बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और बीजेपी पर तमाम आरोप लगाते हुए कहा कि, उनके सीएम पद से इस्तीफा देने का सवाल नहीं। ममता बनर्जी के इस बयान से राज्य में एक तरह का संवैधानिक संकट खड़ा होने की आशंका जताई जा रही है। सवाल उठ रहे हैं कि ममता ने इस्तीफा नहीं दिया तो क्या होगा?

7 मई के बाद अपने आप खत्म हो जाएगा पद?

पूरा मामला समझने के लिए सबसे अहम तारीख है-7 मई 2026। इसी दिन पश्चिम बंगाल की 17वीं विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो रहा है। जैसे ही विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होता है, वह अपने आप खत्म मानी जाती है। इसका मतलब है कि  सरकार के चलने की कानूनी ताकत भी खत्म हो जाती है। यानी ममता बनर्जी इस्तीफा दें या न दें, विधानसभा खत्म होने के बाद वह अपने आप मुख्यमंत्री नहीं रहेंगी।

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सिर्फ आज तक ही है बयान की अहमियत?

यानी ममता बनर्जी के इस्तीफा न देने की मियाद सिर्फ एक दिन यानी आज ही के दिन तक है। इसके बाद उनके इस बयान कि मैं 'इस्तीफा नहीं दूंगी'। इसका भी कोई मतलब नहीं रह जाएगा क्योंकि चुनाव आयोग (ECI) ने चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के बाद नई विधानसभा के गठन के लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है और इसे राज्यपाल को भेज भी दिया है तो ममता बनर्जी के इस्तीफा देने या न देने के लिए भी सिर्फ आज ही का दिन है। 

'तीन महीने से सीएम की तरह काम ही नहीं किया'

वैसे भी ममता बनर्जी बीते तीन महीने से औपचारिक तौर पर सीएम नहीं हैं। इस बात को बताया है टीएमसी सांसद और वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने। उन्होंने ममता बनर्जी का बचाव करते हुए कहा कि ममता व्यावहारिक रूप से सीएम के तौर पर काम नहीं कर रही थीं। उन्होंने कहा कि 'पिछले तीन महीनों से राज्य में आचार संहिता लागू थी, इसलिए ममता बनर्जी व्यावहारिक रूप से मुख्यमंत्री के तौर पर काम नहीं कर रही थीं।। ऐसे में इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता। कल्याण बनर्जी ने कहा कि पिछले 3 महीनों से मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लागू है। सरकार कौन चला रहा था? मुख्य सचिव। इसलिए पिछले 3 महीनों से ममता बनर्जी मुख्यमंत्री के तौर पर काम नहीं कर रही थीं फिर इस्तीफे का सवाल कहां है?'

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राजनीति ज्यादा, कानून कम

संविधान विशेषज्ञ ज्ञानंत सिंह का मानना है कि ममता बनर्जी का यह बयान संविधान से ज्यादा एक राजनीतिक चाल है। यानी इसका असर कानूनी कम और राजनीतिक ज्यादा होगा। उन्होंने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत मुख्यमंत्री और मंत्री राज्यपाल की इच्छा तक अपने पद पर रहते हैं। यानी राज्यपाल चाहें तो उन्हें हटा सकते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अगर राज्यपाल तुरंत मुख्यमंत्री को हटा दें और नई सरकार तैयार न हो, तो राज्य में एक खालीपन आ जाएगा यानी राज्य चलाने वाला कोई नहीं होगा। यह संवैधानिक रूप से सही नहीं होगा।  इसके अलावा उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 356 के तहत अगर ममता खुद को मुख्यमंत्री मानते हुए बड़े फैसले लेने लगें तो राज्यपाल राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर सकते हैं।  

राज्यपाल की भूमिका कितनी अहम?

इस पूरे घटनाक्रम में राज्यपाल की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। अगर कोई मुख्यमंत्री बहुमत खो देता है या नई विधानसभा बन चुकी होती है, तो राज्यपाल नए नेता को सरकार बनाने के लिए बुला सकते हैं। अगर मौजूदा मुख्यमंत्री इस्तीफा देने से इनकार करता है, तब भी राज्यपाल उसे पद से हटा सकते हैं। एक और जरूरी बात यह है कि पुरानी विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो चुका है और नई विधानसभा के लिए चुनाव हो चुके हैं। इसलिए SR बोमई वाला फ्लोर टेस्ट का नियम यहां लागू नहीं होगा। पुरानी विधानसभा में ममता को बिना फ्लोर टेस्ट के भी हटाया जा सकता है।

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संवैधानिक रूप से मृत- एक्सपर्ट का बयान

सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान के जानकार आर के सिंह ने इस पूरे मामले को बेहद सीधी भाषा में समझाया। उन्होंने कहा कि जिस दिन विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो जाता है, उस दिन से मौजूदा मुख्यमंत्री संविधान की भाषा में 'संवैधानिक रूप से मृत' हो जाते हैं। यानी कानूनी तौर पर उनका अस्तित्व खत्म हो जाता है और हमारे संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि कोई 'संवैधानिक रूप से मृत' नेता देश या राज्य चला सके। उन्होंने संविधान के चार अनुच्छेदों का हवाला दिया। 

संविधान क्या कहता है?

इस पूरे विवाद को समझने के लिए संविधान के कुछ अहम अनुच्छेदों को समझना जरूरी है।

  • अनुच्छेद 164 के मुताबिक मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं और मंत्री तब तक पद पर रहते हैं जब तक राज्यपाल चाहें। लेकिन यह भी जरूरी है कि सरकार के पास विधानसभा का बहुमत हो।
  • अनुच्छेद 163 कहता है कि राज्यपाल आमतौर पर मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं, लेकिन खास परिस्थितियों में वे स्वतंत्र निर्णय ले सकते हैं।
  • अनुच्छेद 172 के अनुसार विधानसभा का कार्यकाल पांच साल का होता है और इसके बाद नई विधानसभा का गठन जरूरी है।
  • अनुच्छेद 174 राज्यपाल को विधानसभा बुलाने, स्थगित करने और भंग करने का अधिकार देता है।

एसआर बोमई केस का क्या मतलब है यहां?

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित एसआर बोमई केस का भी जिक्र हो रहा है। इस फैसले में कहा गया था कि सरकार का बहुमत विधानसभा में ही साबित होना चाहिए। लेकिन मौजूदा स्थिति अलग है, क्योंकि पुरानी विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो चुका है और नई विधानसभा के चुनाव हो चुके हैं। इसलिए यहां फ्लोर टेस्ट की जरूरत नहीं पड़ती और राज्यपाल सीधे कार्रवाई कर सकते हैं।

Sona Rajput
By Sona Rajput

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन किया है। साल 2022 ...Read More

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