Manisha Dhanwani
12 Jan 2026
धर्म डेस्क। दुनियाभर में आज मकर संक्रांति हर्ष और उत्साह के साथ मनाई जा रही है। लेकिन मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश और जड़ता से चेतन की ओर बढ़ने का दिव्य मार्ग है। जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो पूरे दुनिया में नई ऊर्जा का संचार होता है। इस साल भी यह उत्सव उसी पौराणिक गौरव के साथ मनाया जा रहा है, जो हमें भीष्म पितामह के संकल्प और श्रीकृष्ण के ज्ञान की याद भी दिलाता है।
बता दें कि , महाभारत के महान योद्धा भीष्म पितामह को 'इच्छा मृत्यु' का वरदान प्राप्त था। कुरुक्षेत्र के युद्ध में बाणों की शैया पर लेटे होने के बावजूद, उन्होंने अपने प्राण त्यागने के लिए मकर संक्रांति (उत्तरायण) का ही चुनाव किया। क्योंकि शास्त्रों के मुताबिक सूर्य के उत्तरायण में होने पर देह त्यागने वाली आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति और 'मोक्ष' प्राप्त होता है। इसलिए पितामह ने 58 दिनों तक असहनीय पीड़ा सही, ताकि वे सूर्य के उत्तर की ओर बढ़ने के साथ अपनी आत्मा को परमात्मा में विलीन कर सकें।
वहीं, श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरायण के महत्व को स्पष्ट किया है। वे कहते हैं कि ज्योति, अग्नि, दिन और उत्तरायण के मार्ग से जाने वाले ब्रह्मज्ञानी सीधे ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं। श्रीकृष्ण के अनुसार, यह काल आध्यात्मिक उन्नति और सकारात्मकता का प्रतीक है। यह समय हमें सिखाता है कि जिस तरह सूर्य उत्तर की ओर बढ़कर शीत को हर लेता है, वैसे ही हमें भी ज्ञान के प्रकाश से अपने जीवन के अज्ञान को मिटाना चाहिए।
यह पर्व सामाजिक और प्राकृतिक संतुलन का भी अनूठा उदाहरण है।
मकर संक्रांति हमें पुराने द्वेषों को भुलाकर नई शुरुआत करने और धर्म के पथ पर अडिग रहने का संदेश देती