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Janmashtami 2026: एक कृष्ण, कई नाम और अनगिनत रूप! मथुरा से द्वारका तक भक्ति का सैलाब, 75 लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान

श्रीकृष्ण सिर्फ एक देवता नही बल्कि भारत की अलग-अलग लोक परंपराओं में बसे एक जीवंत भाव हैं। ब्रज में वे नटखट कान्हा और बांके बिहारी हैं, राजस्थान में श्रीनाथजी, गुजरात में द्वारकाधीश, पुरी में जगन्नाथ और महाराष्ट्र में विठोबा। दक्षिण भारत में भी कृष्ण को अलग नाम और रूप मिले लेकिन हर जगह उनसे जुड़ा प्रेम और भक्ति का भाव एक जैसा है।
Janmashtami 2026: एक कृष्ण, कई नाम और अनगिनत रूप! मथुरा से द्वारका तक भक्ति का सैलाब, 75 लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान
आज जन्मेंगे नंदलाला, कृष्ण भक्ति में रंगेगा देश

नई दिल्ली। जन्माष्टमी के मौके पर देशभर में भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति अलग-अलग रंगों में नजर आती है। कहीं घरों में बाल गोपाल के पदचिह्न बनाए जाते हैं, कहीं दही हांडी की धूम रहती है और कहीं मंदिरों में आधी रात तक विशेष पूजा होती है। खास बात यह है कि भारत के अलग-अलग हिस्सों ने कृष्ण को अपनी संस्कृति और भक्ति के हिसाब से एक खास पहचान दी। ब्रज में वे माखनचोर और बांके बिहारी हैं, द्वारका में द्वारकाधीश, नाथद्वारा में श्रीनाथजी और पंढरपुर में विठोबा। यही विविधता कृष्ण की भक्ति को पूरे देश से जोड़ती है।

ब्रज में नटखट कान्हा की सबसे प्यारी छवि

कृष्ण की क्षेत्रीय यात्रा की शुरुआत ब्रज से करना सबसे स्वाभाविक है। मथुरा, गोकुल और वृंदावन की गलियों में कृष्ण की बाल लीलाओं की याद आज भी लोगों के बीच जीवित है। यहां वे यशोदा के लल्ला, ग्वाल-बालों के साथी और माखन चुराने वाले नटखट कान्हा हैं। वृंदावन में बांके बिहारी का रूप इसी प्रेम भक्ति को सामने लाता है। यहां भगवान को दूर बैठे किसी राजा की तरह नहीं बल्कि अपने बेहद करीब माना जाता है। राधा-कृष्ण की प्रेम भक्ति और ब्रज की लोक संस्कृति ने इस रूप को खास पहचान दी।

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नाथद्वारा में गोवर्धन उठाने वाले श्रीनाथजी

ब्रज से कृष्ण का एक रूप राजस्थान के नाथद्वारा पहुंचता है। यहां भगवान श्रीनाथजी के नाम से पूजे जाते हैं। उनका स्वरूप गोवर्धन पर्वत उठाने वाले बाल कृष्ण से जुड़ा है। नाथद्वारा की खासियत यह है कि यहां भगवान की पूजा केवल मंदिर में दर्शन तक सीमित नहीं रहती। उन्हें बालक की तरह जगाया जाता है, उनका श्रृंगार किया जाता है, भोग लगाया जाता है और फिर विश्राम कराया जाता है। इस परंपरा में भक्त और भगवान के बीच माता-पिता और बच्चे जैसा रिश्ता दिखाई देता है।

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द्वारका में कान्हा बने द्वारकाधीश

कृष्ण की कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, उनका स्वरूप भी बदलता दिखाई देता है। गुजरात की द्वारका में वे बाल गोपाल नहीं बल्कि द्वारकाधीश यानी द्वारका के स्वामी हैं। यहां कृष्ण को राजा, रक्षक और कुशल नेतृत्व करने वाले व्यक्तित्व के रूप में देखा जाता है। समुद्र किनारे बसी द्वारका कृष्ण के जीवन के उस दौर की याद दिलाती है, जब उन्होंने अपने लोगों को सुरक्षित रखने के लिए नई नगरी बसाई थी।

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पुरी में कृष्ण का नाम हुआ जगन्नाथ

ओडिशा के पुरी में कृष्ण की पहचान और भी व्यापक हो जाती है। यहां वे भगवान जगन्नाथ के रूप में पूजे जाते हैं। जगन्नाथ का अर्थ ही है जगत के स्वामी। पुरी की परंपराओं में कृष्ण, विष्णु और जगन्नाथ की भक्ति एक-दूसरे से जुड़ती नजर आती है। यहां भगवान का स्वरूप किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे संसार के आराध्य के रूप में सामने आता है।

दक्षिण में कृष्ण बने सारथी और गुरुवायुरप्पन

तमिलनाडु में कृष्ण का एक खास रूप चेन्नई के पार्थसारथी मंदिर में दिखाई देता है। यहां वे अर्जुन के सारथी हैं। यह रूप कृष्ण के उस पक्ष को सामने लाता है, जिसमें वे मार्गदर्शक और गीता का ज्ञान देने वाले गुरु हैं। केरल में भगवान कृष्ण गुरुवायुरप्पन के रूप में प्रसिद्ध हैं। यहां उनकी भक्ति में बाल कृष्ण के प्रति वात्सल्य और गहरी श्रद्धा दिखाई देती है। दक्षिण भारत की भाषाओं और भक्ति साहित्य ने कृष्ण की कहानी को अपना अलग रंग दिया।

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पंढरपुर में भक्त के लिए रुक गए विठोबा

महाराष्ट्र के पंढरपुर में कृष्ण को विठोबा के नाम से पूजा जाता है। वारकरी परंपरा में भगवान और भक्त के रिश्ते की बेहद भावुक कहानी सुनाई जाती है। मान्यता है कि भक्त पुंडलीक की भक्ति से प्रभावित होकर कृष्ण उनके पास पहुंचे। पुंडलीक उस समय अपने माता-पिता की सेवा में व्यस्त थे। उन्होंने भगवान को इंतजार करने के लिए ईंट पर खड़े होने को कहा। कृष्ण वहीं खड़े रहे और इसी रूप में विठोबा कहलाए।

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नाम और रूप बदले, कृष्ण का भाव नहीं

भारत में कृष्ण के रूप अलग-अलग हैं लेकिन उनके प्रति लोगों की श्रद्धा एक ही धागे से जुड़ी है। किसी के लिए वे शरारती बालक हैं, किसी के लिए राजा, किसी के लिए गुरु तो किसी के लिए भक्त के इंतजार में खड़े भगवान। यही वजह है कि कृष्ण की भक्ति किसी एक भाषा, प्रदेश या परंपरा में सीमित नहीं रही। भारत ने उन्हें अपने-अपने रंग में अपनाया और हर जगह कान्हा का एक नया रूप सामने आया। कृष्ण के नाम भले बदलते रहे लेकिन प्रेम, भक्ति और अपनापन हमेशा वही रहा।

Aditi Rawat
By Aditi Rawat

अदिति रावत | MCU, भोपाल से M.Sc.(न्यू मीडिया टेक्नॉलजी)| एंकर, न्यूज़ एक्ज़िक्यूटिव की जिम्मेदारियों...

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