संजय कुमार तिवारी, जबलपुर। कम पढ़े-लिखे ट्रक चलाकर परिवार चलाने वाले एक पिता, महीने की महज 12 से 15 हजार रुपए की कमाई, किराए का घर और चार बच्चों की जिम्मेदारी। ऐसे हालात में आमतौर पर कोई भी पिता अपने बेटे को सुरक्षित भविष्य की सलाह देता है लेकिन छिंदवाड़ा जिले के बोरगांव गांव निवासी रामअवध यादव की कहानी अलग है। उन्होंने अपने बेटे मंगेश यादव के सपने को सिर्फ समझा ही नहीं बल्कि उसे पूरा करने के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी। शुरुआत में उन्हें क्रिकेट जैसे महंगे खेल से डर लगता था और वे चाहते थे कि बेटा पढ़ाई कर नौकरी करे लेकिन मंगेश का जुनून देखकर उनका नजरिया बदल गया और यहीं से एक संघर्षभरी यात्रा शुरू हुई।

रामअवध यादव बताते हैं कि वे ट्रक ड्राइवर हैं और महीने में 12-15 हजार रुपए ही कमा पाते थे। घर किराए का है, जिसमें 1500 रुपए किराया और करीब 1000 रुपए बिजली बिल में चला जाता है। तीन बेटियां और एक बेटा, सभी की पढ़ाई का खर्च उठाना आसान नहीं था। ऐसे में घर चलाना ही मुश्किल था लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपने बेटे के सपनों को टूटने नहीं दिया।
जब मंगेश ने क्रिकेट खेलने की इच्छा जताई तो पिता ने साफ मना कर दिया था। उनका मानना था कि क्रिकेट एक महंगा खेल है और उनकी आर्थिक स्थिति इसकी इजाजत नहीं देती। उन्होंने बेटे को पढ़ाई पर ध्यान देने की सलाह दी, लेकिन मंगेश का मन क्रिकेट में ही था। बेटे की लगन और गांव के लोगों के समझाने के बाद उन्होंने फैसला बदला और बेटे का साथ देने का मन बना लिया।
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रामअवध यादव ने बताया कि बेटे को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें करीब 8-9 लाख रुपए तक का कर्ज लेना पड़ा। उनकी आमदनी इतनी नहीं थी कि वे यह खर्च उठा सकें लेकिन उन्होंने कभी मंगेश की ट्रेनिंग रुकने नहीं दी। कई बार हालात इतने खराब हो जाते थे कि उधार लेना ही एकमात्र विकल्प बचता था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
बेटे के लिए उन्होंने अपनी जिंदगी का हर आराम छोड़ दिया। वे 3-3 और 4-4 दिन तक घर नहीं लौटते थे और लगातार ट्रक चलाते थे ताकि ज्यादा पैसे कमा सकें। अपनी जरूरतों को पीछे छोड़कर उन्होंने सिर्फ एक ही लक्ष्य रखा - बेटे का सपना पूरा करना। यह संघर्ष कई सालों तक लगातार चलता रहा।

जब मंगेश का चयन जिला, संभाग और प्रदेश स्तर पर हुआ, तो उसे बेहतर कोचिंग के लिए दिल्ली भेजा गया। वहां खर्च और बढ़ गया। रामअवध यादव ने करीब चार साल तक हर महीने 15 हजार रुपए भेजे। इस दौरान उन्होंने दोस्तों से उधार लिया और अपनी सीमाओं से कहीं ज्यादा जाकर बेटे का साथ दिया।
रामअवध यादव मानते हैं कि कई बार ऐसा लगा कि अब यह संभव नहीं होगा। पैसे की कमी, कर्ज का बोझ और जिम्मेदारियां—सब कुछ एक साथ था। लेकिन जब भी वे बेटे की मेहनत देखते उन्हें हिम्मत मिलती थी। उनका कहना है कि जब बेटा हार नहीं मान रहा था, तो वे कैसे पीछे हट सकते थे।
आज वही मंगेश यादव IPL में RCB की टीम का हिस्सा बन चुका है और उसे 5 करोड़ 20 लाख रुपए में खरीदा गया है। यह सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं बल्कि एक पिता के त्याग और संघर्ष की जीत है। इस सफलता पर रामअवध यादव भावुक हो जाते हैं और कहते हैं कि अब लगता है उनकी सारी मेहनत सफल हो गई और जो कर्ज लिया था, उसका बोझ भी हल्का हो गया।
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मंगेश यादव के पिता रामअवध यादव का कहना है कि अगर बच्चा मेहनत कर रहा है तो उसे रोकना नहीं चाहिए। पैसे की कमी हर किसी के पास होती है लेकिन अगर हौसला मजबूत हो, तो कोई भी सपना पूरा किया जा सकता है। उनके अनुसार, बच्चों के सपनों को समझना और उनका साथ देना ही सबसे जरूरी है।