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Shivani Gupta
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Manisha Dhanwani
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मध्य प्रदेश में कानून व्यवस्था पर सवाल इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि पुलिस, जो सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालती है, खुद गंभीर आरोपों में फँसती दिखाई दे रही है। हाल ही में विधानसभा में पेश रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दो साल में तीन सौ उनतीस पुलिसकर्मियों पर अलग-अलग मामलों में एफआईआर दर्ज हुई है। यह सिर्फ एक संख्या नहीं है, बल्कि उस भरोसे में आई गिरावट को भी दिखाती है जिसे लोग पुलिस से जोड़ते हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा कांग्रेस विधायक बाला बच्चन के सवाल के जवाब में दिए गए आंकड़ों से साफ है कि लूट, अत्याचार, छेड़छाड़ और उत्पीड़न जैसे आरोप अब पुलिस वालों पर भी लग रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि जब जिम्मेदारी निभाने वाले ही आरोपों में घिरें, तो आम नागरिक अपनी सुरक्षा को लेकर किस पर भरोसा करे?
पिछले दो साल में मध्य प्रदेश पुलिस के खिलाफ दर्ज हुए मामलों ने पूरे विभाग की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, तीन सौ उनतीस पुलिसकर्मियों पर एफआईआर दर्ज होना यह दिखाता है कि पुलिस बल के अंदर अनुशासन और जिम्मेदारी का स्तर पहले जितना मजबूत नहीं रह गया है। इन मामलों में लूट, मारपीट, छेड़छाड़, उत्पीड़न, धार्मिक भावनाएं भड़काने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और नागरिकों से जुड़े कई गंभीर आरोप शामिल हैं। यह साफ झलकता है कि पुलिस प्रशासन में लापरवाही बढ़ रही है और सिस्टम की अंदरूनी कमजोरियाँ अब सामने आने लगी हैं।
मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य में पुलिसकर्मियों पर लगातार काम का दबाव बना रहता है, जिसकी वजह से उनकी कार्यशैली और फैसलों पर असर दिखाई देता है। लगातार लंबे समय तक ड्यूटी, मानसिक तनाव, सीमित संसाधन, राजनीतिक हस्तक्षेप और कई बार पर्याप्त प्रशिक्षण की कमी- ये सभी स्थितियाँ मिलकर गलत व्यवहार और गलत फैसलों का कारण बनती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि पुलिसिंग का तनाव कई बार ऐसे मामलों को जन्म देता है, लेकिन इसे किसी भी गलती का बहाना नहीं माना जा सकता। क्योंकि पुलिस का हर कदम सीधे आम जनता को प्रभावित करता है। ऐसे मामलों के बढ़ने से लोगों का भरोसा कमजोर होता है और साफ दिखता है कि इस बार सामने आए आंकड़े पहले की तुलना में कहीं ज्यादा गंभीर हैं।
विधानसभा में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा साझा की गई जानकारी से पता चलता है कि तीन सौ उनतीस आरोपित पुलिसकर्मियों में से दो सौ उनसठ मामलों में अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी गई है, यानी इन मामलों की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। वहीं इकसठ मामले अब भी जांच के दौर में हैं, जिनमें सबूत और परिस्थितियों की विस्तृत पड़ताल की जा रही है। सात मामलों को अदालतों ने पहले ही खारिज कर दिया है और दो मामलों में न्यायालय द्वारा कार्रवाई पर रोक लगाई गई है। सरकार का दावा है कि सख्त कदमों से व्यवस्था सुधरेगी, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या सुधार सिर्फ केस दर्ज करने और चार्जशीट दाखिल करने से ही आएगा?
समय-समय पर यह देखा गया है कि कई पुलिसकर्मी परिस्थितियों को समझे बिना जल्दबाज़ी में फैसले ले लेते हैं, जिससे विवाद बढ़ते हैं। इसलिए जरूरी है कि उन्हें संवेदनशीलता और व्यवहारिक प्रशिक्षण नियमित रूप से दिया जाए, ताकि वे जनता से जुड़े मुद्दों को बेहतर तरीके से संभाल सकें। कई बार वर्दी का गलत इस्तेमाल भी हालात को बिगाड़ देता है, जिससे पारदर्शिता पर असर पड़ता है। राज्य में, और देशभर में भी, पुलिस पर राजनीतिक दबाव के आरोप लगते रहे हैं, जो सीधे अनुशासन और कार्यशैली को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा, आंतरिक जांच की प्रक्रिया अक्सर धीमी होती है, जिससे गलतियों को समय रहते रोका नहीं जा पाता और आगे चलकर हालात और खराब हो जाते हैं। ऐसे में यह स्पष्ट है कि पुलिस विभाग में सुधार केवल आवश्यक ही नहीं, बल्कि तत्काल जरूरत बन चुका है।