जबलपुर। दो से अधिक संतानों की शर्त के चलते एक कर्मचारी की नौकरी चली गई और करीब 10 साल बाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने पर भी उसे राहत नहीं मिल सकी। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने तीसरी संतान के पिता की बर्खास्तगी को सही ठहराते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी।
यह मामला रीवा के ग्राम पड़रिया में रहने वाले बृजलाल साकेत की ओर से दाखिल किया गया था। आवेदक का कहना था कि रीवा जिला न्यायालय में ड्राइवर के पद पर उसकी अस्थाई नियुक्ति 20 जनवरी 2015 को हुई थी। 3 दिसंबर 2015 को उसे यह कहते हुए बर्खास्त कर दिया गया कि उसकी तीसरी संतान है। इसके बाद याचिकाकर्ता मजदूरी करने गुजरात के सूरत शहर चला गया। वर्ष 2018 में मप्र हाईकोर्ट द्वारा तीसरी संतान के एक पिता को बहाल करने के संबंध में दिए गए फैसले की जानकारी मिलने पर याचिकाकर्ता ने यह याचिका वर्ष 2025 में दाखिल की।
मामले पर हुई सुनवाई के दौरान अनावेदकों की ओर से अधिवक्ता संदीप शुक्ला ने दलीलें रखीं। सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने
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एक अन्य अहम फैसले में मप्र हाईकोर्ट ने कहा है कि शादी के बाद कोई भी बेटी अपने पिता की हैसियत का फायदा नहीं ले सकती है। यह फायदा तभी मिल सकता है, जब तक कि बेटी यह साबित न करे कि वह पति से अलग रह रही है या उसे भरण-पोषण नहीं मिल रहा। इन आधारों के साथ जस्टिस विवेक जैन की सिंगल बेंच ने पिता के बीपीएल कार्ड के आधार पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के पद पर नियुक्ति पाने वाली महिला की याचिका खारिज कर दी और उसकी नियुक्ति रद्द करने के फैसलों को सही ठहराया।
हाईकोर्ट ने यह फैसला रीवा जिले की जनपद पंचायत जवा के ग्राम सितलहा में रहने वाली रूबी विश्वकर्मा की याचिका पर दिया। दरअसल, रूबी की नियुक्ति आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के रूप में 18 सितंबर 2017 को हुई थी। इस बारे में की गई शिकायत पर एडिशनल कलेक्टर ने याचिकाकर्ता की नियुक्ति अवैध ठहराई थी। इस फैसले को एडिशनल कमिश्नर द्वारा भी सही ठहराए जाने पर यह याचिका हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी।
मामले पर हुई सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता मुकेश शुक्ला और शिकायतकर्ता देशरानी वर्मा की ओर से अधिवक्ता हिमान्शु शुक्ला ने दलीलें रखीं। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने शादी के 4 साल बाद अपने पिता के बीपीएल कार्ड के आधार पर यह अनुचित लाभ, जो गलत है।