मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के बीच ईरान ने अमेरिका को कई मोर्चों पर इस तरह घेरा है कि हालात उसके लिए मुश्किल होते जा रहे हैं। ईरान ने न सिर्फ सैन्य स्तर पर जवाब दिया है बल्कि रणनीतिक तरीके से ऐसी चालें चली हैं जिससे अमेरिका की योजनाएं उलझती दिख रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार कड़े बयान दे रहे हैं लेकिन जमीनी हालात उनके दावों के उलट नजर आ रहे हैं।
ईरान की सबसे बड़ी चाल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करना रही। यह दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग है जहां से करीब 20% ग्लोबल तेल सप्लाई गुजरती है। इसके बंद होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उछाल आया है और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है। हालांकि ईरान ने भारत, रूस और चीन जैसे अपने मित्र देशों के लिए यह रास्ता खुला रखा है।
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इस युद्ध का असर खाड़ी देशों में भी साफ दिखाई दे रहा है। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, बहरीन और कुवैत जैसे देशों में तनाव और असुरक्षा का माहौल है। इन देशों की इंडस्ट्रियल साइट्स और ऊर्जा सप्लाई पर खतरा मंडरा रहा है जिससे आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।
ईरान ने सीधे तौर पर अमेरिका को अपना लक्ष्य बनाते हुए उसके विदेशी सैन्य ठिकानों पर हमले किए हैं। अल धाफरा एयरबेस, अल उदीद एयरबेस और प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरें सामने आई हैं। इन हमलों में अमेरिकी सैनिकों के घायल होने और सैन्य संसाधनों को नुकसान पहुंचने की जानकारी भी सामने आई है।
इस युद्ध का आर्थिक असर भी अमेरिका पर भारी पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका रोजाना करीब 1 अरब डॉलर तक खर्च कर रहा है। वहीं फ्रांस, ब्रिटेन, इटली और स्पेन जैसे सहयोगी देशों ने भी इस युद्ध में खुलकर साथ देने से दूरी बना ली है। इससे अमेरिका की स्थिति और कमजोर होती दिख रही है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने हालिया संबोधन में कहा है कि अमेरिका अपने मिशन के अंतिम चरण में है और जल्द ही लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा। उन्होंने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए भविष्य में और बड़े हमले की बात भी कही है। हालांकि जमीनी स्तर पर हालात इसके उलट नजर आ रहे हैं जहां ईरान लगातार जवाबी कार्रवाई कर रहा है और पीछे हटने को तैयार नहीं है।
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पांचवें हफ्ते में पहुंच चुके इस तनाव में अब तक कोई स्पष्ट नतीजा नहीं निकल पाया है। ईरान की रणनीति और अमेरिका पर बढ़ते दबाव को देखते हुए यह जंग लंबी खिंच सकती है जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर लगातार पड़ता रहेगा।