
हर्षित चौरसिया, जबलपुर। डॉ. वीके रैना ने अपने जीवन के साथ-साथ मृत्यु के बाद भी चिकित्सा शिक्षा को समर्पित कर दिया। उन्होंने अपनी देह दान कर छात्रों के लिए सीखने का मार्ग खोला। 60 वर्षों तक मेडिकल कॉलेज से जुड़े रहे और अंतिम समय तक पढ़ाते रहे। उनका योगदान और समर्पण चिकित्सा जगत के लिए हमेशा प्रेरणा बना रहेगा। 13 अक्टूबर 1945 में जन्मे डॉ. रैना का 81 वर्ष की उम्र में बुधवार को निधन हो गया, लेकिन अपनी अंतिम इच्छा के अनुरूप वे आज भी मेडिकल कॉलेज में मौजूद हैं। वे एक गुरु के रूप में नहीं, बल्कि एक किताब के रूप में नई पीढ़ी को शिक्षा दे रहे हैं।
मेडिकल कॉलेज के प्रभारी डीन और प्लास्टिक सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. पवन अग्रवाल ने बताया कि डॉ. रैना का इस मेडिकल कॉलेज से 60 वर्षों से भी पुराना नाता था। 1963 में उन्होंने इसी संस्थान से अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू की थी। इसके बाद मास्टर ऑफ सर्जरी और मुंबई से एमसीएच की डिग्री हासिल करने के बाद वे 1972 में यहां डेमोस्ट्रेटर के रूप में नियुक्त हुए। 2007 में रिटायर्ड होने के बाद भी उन्होंने पढ़ाना नहीं छोड़ा। समर्पण ऐसा था कि गंभीर बीमारी के बावजूद मृत्यु से केवल दो माह पहले तक कॉलेज पहुंचकर भावी डॉक्टरों को सर्जरी की बारीकियां सिखाते रहे। उनका पूरा जीवन इसी संस्थान और चिकित्सा शिक्षा को समर्पित रहा।
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डॉ. रैना के बेटे रोहित रैना ने बताया कि उनके पिता का मानना था कि उन्होंने भी किसी के शरीर का डिसेक्शन करके ही यह विधा सीखी है, इसलिए उनकी देह भी उन्हीं छात्रों के काम आनी चाहिए जहां से उन्होंने दीक्षा ली है। उन्होंने पहले ही देहदान के फार्म पर अपनी सहमति दे दी थी। यह उनका जीवन का एक बड़ा संकल्प था जिसे उन्होंने अंतिम समय तक निभाया। उनका यह निर्णय न केवल उनके विचारों को दर्शाता है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल भी बन गया है।

डॉ. रैना के चिकित्सा क्षेत्र में अतुलनीय योगदान और उनके महान संकल्प को देखते हुए उन्हें प्रशासन द्वारा गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। इस अवसर पर कलेक्टर राघवेन्द्र सिंह सहित कई डॉक्टर और अधिकारी मौजूद रहे। यह सम्मान उनके जीवनभर की सेवा और समर्पण का प्रतीक था। देहदान की प्रक्रिया भी पूरे सम्मान और गरिमा के साथ पूरी की गई। इस दौरान मौजूद लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके योगदान को याद किया।
डॉ. रैना के प्रिय शिष्य और पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. विकेश अग्रवाल ने बताया कि वे केवल एक शिक्षक और सर्जन ही नहीं, बल्कि एक महान आविष्कारक भी थे। 40 वर्ष पहले उन्होंने डबल निमोनिया के मरीजों के लिए रैना रोमो ड्रेन नामक उपकरण बनाया था। उन्होंने इस उपकरण के निर्माण के लिए किसी कंपनी से रॉयल्टी नहीं ली ताकि इसकी कीमत 100 रुपए के अंदर रहे, यह उनकी शर्त थी। आज यह उपकरण दुनिया के 20 देशों में मरीजों की जान बचा रहा है। उन्होंने सर्जरी की 8 सुपर स्पेशलिटी जैसे यूरो, न्यूरो, पीडियाट्रिक और प्लास्टिक सर्जरी भी शुरू करवाईं, जो आज भी उनकी विरासत को आगे बढ़ा रही हैं।