सीजफायर के बाद पाकिस्तान खुद को मध्यस्थ बताकर श्रेय लेने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स और बयानों में चीन की भूमिका ज्यादा अहम बताई जा रही है। ऐसे में पाकिस्तान की दावेदारी पर सवाल उठने लगे हैं।
सीजफायर की घोषणा के बाद पाकिस्तान की मीडिया और कुछ संस्थानों ने इसे बड़ी उपलब्धि बताना शुरू कर दिया। वहां खुले तौर पर शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की मांग की जा रही है। मीडिया लगातार यह नैरेटिव बना रही है कि पाकिस्तान ने युद्ध रुकवाने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि इस मांग को कई लोग हास्यास्पद और झूठ बता रहे हैं।
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रिपोर्ट्स के मुताबिक वहां के रिटायर्ड अधिकारियों ने पाकिस्तान की तारीफ की है। बताया जा रहा है कि इसको लेकर एक लेख में कहा गया कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की। साथ ही यह भी दावा किया गया कि पाकिस्तान ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने में मदद की। सीजफायर के बाद श्रेय लेने की इस राजनीति ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। जहां पाकिस्तान खुद को बड़ा खिलाड़ी बताने में लगा है, वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन की भूमिका ज्यादा मजबूत मानी जा रही है। ऐसे में नोबेल शांति पुरस्कार की मांग पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
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कई रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि पाकिस्तान की भूमिका उतनी अहम नहीं थी जितनी बताई जा रही है। विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान ने अमेरिका के इशारे पर काम किया। कुछ रिपोर्ट्स में शहबाज और मुनीर को सिर्फ मोहरा तक बताया गया है। अमेरिका ने खुद पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं।
सीजफायर को लेकर सबसे अहम भूमिका चीन की बताई जा रही है। खुद डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि चीन ने ईरान को बातचीत के लिए राजी किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरानी अधिकारियों ने चीन की सक्रियता की पुष्टि की। बताया गया कि चीन ने दबाव बनाकर ईरान को सीजफायर के लिए तैयार किया।