पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद इस वक्त दुनिया की सबसे अहम कूटनीतिक जगह बन चुकी है। यहां ईरान और अमेरिका के बीच उच्चस्तरीय वार्ता जारी है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस बातचीत को ‘करो या मरो’ जैसी स्थिति बताया है। यानी अब फैसला होना है या तो शांति की राह खुलेगी या तनाव और बढ़ेगा।
8 अप्रैल को हुए युद्धविराम के बाद यह पहली बड़ी बैठक है। इसीलिए इसे बेहद अहम माना जा रहा है। माना जा रहा है कि इस बातचीत से तय होगा कि दोनों देशों के बीच बनी शांति कायम रहेगी या हालात फिर बिगड़ सकते हैं। शनिवार सुबह ईरान का प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री कार्यालय के लिए रवाना हुआ। इसकी जानकारी मुंबई स्थित ईरानी वाणिज्य दूतावास ने सोशल मीडिया पर दी।
ईरान की ओर से इस बैठक का नेतृत्व संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागैर गालिबफ कर रहे हैं। वे कड़ी सुरक्षा के बीच आधी रात के बाद इस्लामाबाद पहुंचे। वहीं अमेरिका की तरफ से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जैरेड कुशनर शामिल हैं। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल भी शनिवार सुबह विशेष विमान से इस्लामाबाद पहुंचा।
ईरान के प्रथम उपराष्ट्रपति मोहम्मद रेजा आरिफ ने बातचीत से पहले बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका ‘अमेरिका फर्स्ट’ की सोच के साथ आता है, तो समझौता संभव है और इससे दोनों देशों के साथ पूरी दुनिया को फायदा होगा, लेकिन अगर बातचीत ‘इजरायल फर्स्ट’ नीति के आधार पर हुई, तो कोई समझौता नहीं होगा। ऐसे में ईरान अपनी सुरक्षा और मजबूत करेगा, जिससे हालात बिगड़ सकते हैं और दुनिया को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने इन वार्ताओं के लिए 15 दिन का समय तय किया है। लेकिन शुरुआती 48 घंटे सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। इन्हीं 48 घंटों में तय होगा कि बातचीत सही दिशा में जा रही है या फिर टकराव की ओर बढ़ रही है।
इस बैठक की सुरक्षा भी चर्चा में है। ईरानी प्रतिनिधिमंडल के पाकिस्तान की हवाई सीमा में प्रवेश के दौरान AWACS (निगरानी विमान), इलेक्ट्रॉनिक युद्धक विमान और लड़ाकू जेट तैनात किए गए। सिर्फ आसमान ही नहीं, जमीन पर भी सुरक्षा के कड़े इंतजाम हैं। इस्लामाबाद और रावलपिंडी में भारी संख्या में सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं, ताकि किसी भी तरह की गड़बड़ी से बचा जा सके।
यह सिर्फ एक बैठक नहीं, बल्कि एक ऐसा मोड़ है जहां से मध्य पूर्व और दुनिया की राजनीति नई दिशा ले सकती है। अगर समझौता होता है तो यह स्थायी शांति की शुरुआत हो सकती है। लेकिन अगर बातचीत असफल रही, तो तनाव फिर बढ़ सकता है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस्लामाबाद पर टिकी है।