ईरान-इजरायल, अमेरिका के बीच चल रहे विध्वंशी युद्ध में आखिर किस देश की हार है और किसकी जीत? हालांकि यह सच है कि युद्ध कभी कोई जीत नहीं। इसमें सिर्फ और सिर्फ हार और नुकसान होना तय है। अभी जो कुछ भी हालिया स्थिति पूरे विश्व की चल रही उसमें किसे कितना नुकसान होना है ये तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन तीनों देशों की इस पूरे मसले पर अपनी-अपनी वर्तमान स्थिति है। अगर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावों की बात की जाए तो उनका मानना है कि अमेरिका के पास अहम हथियारों की "लगभग असीमित सप्लाई है। वहीं ईरान के रक्षा मंत्रालय का कहना है कि, उसके पास "दुश्मन का लंबे समय तक मुकाबला करने की क्षमता" है।
ईरान-इजरायल युद्ध को लेकर कई संभावित बातें सामने आ रही हैं। अगर यह लड़ाई लंबी चली तो किसकी जीत होगी, किसकी हार? कौन सा देश नुकसान के सबसे ज्यादा करीब होगा? क्या ईरान वाकई अमेरिका- इजरायल की तुकबंदी के आगे टिक पाएगा? अगर हथियारों के संग्रहण की दृष्टि से देखा जाए तो अमेरिका और इजरायल इस मामले में ईरान से काफी आगे है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ हथियारों का भंडार और उनकी सप्लाई ही युद्ध का नतीजा तय करता है? पहले के युद्ध के रिकार्ड को अगर ध्यान से देखा जाए तो यूक्रेन काफी लंबे समय से रूस की तुलना में कम हथियारों और कम सैनिकों के बावजूद उससे लड़ रहा है। वहीं, तीन साल से अधिक समय तक भारी बमबारी के बावजूद इसराइल ग़ज़ा में हमास को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाया। ठीक इसी तरह यमन में हूती विद्रोही भी एक साल की अमेरिकी बमबारी के बाद बचे रहे। लेकिन इस बात को नकारा भी नहीं जा सकता कि हथियारों का भंडार और सप्लाई युद्ध में अहम भूमिका निभाती है।
ये भी पढ़ें: ईरान ने इजरायल पर दागीं क्लस्टर मिसाइलें! क्या है यह खतरनाक हथियार जिससे एक साथ कई जगह होते हैं धमाके
इजरायल- अमेरिका और ईरान के बीच जो जंग छिड़ी है उसमें दोनों देशों के बीच होने वाले हमलों की रफ्तार काफी तेज है। हालांकि दोनों पक्ष जितनी तेजी से हथियार इस्तेमाल कर रहे हैं, उतनी तेजी से उनका उत्पादन नहीं हो पा रहा है। (आईएनएसएस) ने रिसर्च कर यह अनुमान लगाया है कि अमेरिका और इजरायल अब तक 2,000 से अधिक हमले कर चुके हैं, जिनमें कई तरह के हथियार इस्तेमाल हुए हैं। जवाबी कार्रवाई में ईरान अब तक 571 मिसाइलें और 1,391 ड्रोन दाग चुका है। इनमें से कई को तो हवा में ही मार गिराया गया, लेकिन अगर यह लड़ाई लंबी चली तो दोनों पक्षों के लिए स्थिति गंभीर होना तय है।
ईरान की ओर से दागी जा रही मिसाइलों की संख्या में पहले ही कमी देखी गई है। इस बात की पुष्टि पश्चिमी देशों के अधिकारियों ने की है। एक सर्वेक्षण के अनुसार युद्ध के पहले दिन सैकड़ों मिसाइलें दागी गई थीं, जो अब घटकर दर्जनों रह गई हैं। युद्ध से पहले अनुमान था कि ईरान के पास कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें 2000 से भी ज्यादा हैं। हालांकि कोई भी देश अपने पास मौजूद हथियारों की सही संख्या बताता नहीं, क्योंकि इससे दुश्मन देश को उलझाकर रखना आसान होता है। अमेरिका के शीर्ष सैन्य कमांडर जनरल डैन केन ने कहा कि, शनिवार को शुरू हुई जंग के पहले दिन की तुलना में ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों की लॉन्चिंग 86 फीसदी घटती चली गई।
अमेरिकी सेंट्रल कमान (सेंटकॉम) के अनुसार, पिछले 24 घंटों में ही ईरान के लड़ाकू विमानों में 23 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। सूत्रों के हवाले से यह माना जा रहा था कि ईरान ने कई हजार शाहेद 'वन-वे अटैक' ड्रोन मिसाइल बना रखे हैं। इस तकनीक को उसने रूस को भी दिया, जो यूक्रेन में इनका इस्तेमाल कर रहा है। यहां तक कि अमेरिका ने भी इस डिजाइन की नकल की है। लेकिन जनरल केन के मुताबिक़, दोनों देशों के जंग के पहले दिन के बाद से ईरान के ड्रोन हमलों में 73 फ़ीसदी की गिरावट देखी गई है। अनुमान है कि अब ईरान तेज रफ़्तार से हमले जारी रखने में कठिनाई महसूस कर रहा है। हालांकि यह भी संभव है कि ईरान अपने भंडार को बचाने के लिए जानबूझकर हमले कम कर रहा हो, लेकिन यह भी एक सच है कि ईरान के लिए हथियारों के भंडार को लंबे समय तक बनाए रखना मुश्किल होगा। इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिका और इजरायल के लड़ाकू विमान अब ईरान के ऊपर अपनी हवाई बढ़त बना चुके हैं।
क्योंकि ईरान का ज़्यादातर एयर डिफ़ेंस सिस्टम अब नष्ट हो चुका है। उसकी वायु सेना भी अब पहले जैसी प्रभावी नहीं रह गई है। सेंटकॉम के अनुसार, अब अमेरिका और इजरायल के लिए ईरान की लड़ने की क्षमता को कमजोर करना आसान हो सकता है, लेकिन अभी भी ईरान के सभी हथियार भंडार को नष्ट करना अमेरिका और इजरायल के लिए मुश्किल है। इसकी वजह ईरान का क्षेत्रफल है, जोकि फ्रांस से लगभग तीन गुना बड़ा है। इसलिए ईरान आसानी से हथियारों को जमीन में छिपा सकता है।
इजरायल को अमेरिका की तरफ से ईरान-इजरायल युद्ध में जो मदद मिल रही वही इजरायल की असल ताकत है। इसी के दम पर वह ईरान को दबाने में कामयाब साबित हो रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिका के पास दुनिया की सबसे ताक़तवर सेना है। उसके हथियारों का भंडार किसी भी दूसरे देश से अधिक है। लेकिन अमेरिकी सेना मुख्य रूप से महंगे निर्देशित हथियारों को बनाने और उसपर निर्भर रहने में यकीन रखती है। जिस कारण हथियारों का उत्पादन सीमित मात्रा में ही संभव हो पाता है। सूत्रों के अनुसार ट्रंप ने रक्षा कंपनियों की बैठक बुलाई है और यह तय किया गया है कि युद्ध की वजह से हथियारों के उत्पादन में तेजी लाई जा सके। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि अमेरिका के संसाधनों पर भी ईरान-इजरायल युद्ध का दवाब पड़ना तय है। लेकिन यह भी सच है कि अगर इजरायल, अमेरिका ईरानी जंग लंबी चली तो ईरान को इसका अधिक नुकसान उठाना ही पड़ेगा।