मिडिल ईस्ट में चल रहा इजरायल-ईरान युद्ध लगातार खतरनाक होता जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने इजरायल पर क्लस्टर म्यूनिशन वाली मिसाइलों से हमला किया है। इस हमले के बाद इजरायल के कई शहरों में धमाकों की आवाजें सुनी गईं और कई इलाकों में सायरन बजने लगे।
बताया जा रहा है कि, मिसाइलें हवा में ही फट गईं और उनके अंदर मौजूद छोटे-छोटे बम बड़े इलाके में फैल गए। यही वजह है कि, इन हथियारों को दुनिया के सबसे खतरनाक हथियारों में गिना जाता है। इस हमले ने पूरे Middle East Conflict को और गंभीर बना दिया है। अगर इस तरह के हथियारों का इस्तेमाल बढ़ता है तो यह युद्ध और ज्यादा विनाशकारी हो सकता है।
क्लस्टर मिसाइल एक खास तरह की मिसाइल होती है, जिसमें एक बड़ा वारहेड नहीं बल्कि कई छोटे-छोटे बम भरे होते हैं। इन छोटे बमों को सबम्यूनिशन या बमलेट कहा जाता है। जब मिसाइल अपने लक्ष्य के पास पहुंचती है, तो यह हवा में ही खुल जाती है और इसके अंदर मौजूद दर्जनों छोटे बम अलग-अलग दिशाओं में फैल जाते हैं। इसके बाद ये बम जमीन पर गिरकर अलग-अलग जगह विस्फोट करते हैं। यानी एक मिसाइल एक ही जगह नहीं बल्कि कई किलोमीटर के इलाके में एक साथ धमाके कर सकती है।
इसी वजह से क्लस्टर हथियारों को बेहद खतरनाक माना जाता है, क्योंकि इनसे सैन्य ठिकानों के साथ-साथ नागरिक इलाकों को भी भारी नुकसान हो सकता है।
साधारण मिसाइल और क्लस्टर मिसाइल के बीच सबसे बड़ा अंतर उनके विस्फोट के तरीके में होता है।
साधारण मिसाइल
क्लस्टर मिसाइल
इस तरह एक क्लस्टर मिसाइल एक साथ कई जगहों पर नुकसान पहुंचा सकती है।
इजरायली सेना के मुताबिक ईरान ने जो मिसाइल दागी, वह करीब 7 किलोमीटर की ऊंचाई पर खुल गई। उस मिसाइल से करीब 20 सबम्यूनिशन बाहर निकले और लगभग 8 किलोमीटर के दायरे में फैल गए। रिपोर्ट के मुताबिक, इन बमों में से एक तेल अवीव के पास स्थित आज़ोर कस्बे में एक घर पर गिरा, जिससे घर को नुकसान पहुंचा। हालांकि, इस घटना में कोई मौत नहीं हुई, लेकिन कई लोग घायल हुए और काफी संपत्ति का नुकसान हुआ। हमले के बाद इजरायली सेना ने लोगों को चेतावनी दी कि, जमीन पर पड़े बिना फटे बम बेहद खतरनाक हो सकते हैं।
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क्लस्टर हथियारों का सबसे बड़ा खतरा उन बमों से होता है जो गिरने के बाद फटते नहीं हैं। इनमें से कई बम जमीन पर पड़े रहते हैं और सालों तक खतरा बने रहते हैं। अगर कोई व्यक्ति गलती से उन पर पैर रख दे या उन्हें छेड़ दे तो वे अचानक फट सकते हैं। इसी वजह से क्लस्टर बमों को मिनी लैंडमाइन जैसा खतरा भी माना जाता है।
दुनिया के कई देशों में युद्ध खत्म होने के वर्षों बाद भी ऐसे अनफटे बम मिलते रहते हैं और हर साल इनसे नागरिक घायल होते हैं।
क्लस्टर हथियारों की खतरनाक प्रकृति को देखते हुए दुनिया के कई देशों ने इन पर प्रतिबंध लगा रखा है। साल 2008 में कन्वेंशन ऑन क्लस्टर म्यूनिशन नाम की एक अंतरराष्ट्रीय संधि बनी थी। इस संधि के तहत देशों ने क्लस्टर हथियारों के इस्तेमाल, उत्पादन, भंडारण और ट्रांसफर पर रोक लगाने का फैसला किया। आज 100 से ज्यादा देश इस संधि से जुड़े हैं।
हालांकि ईरान, इजरायल और अमेरिका इस संधि का हिस्सा नहीं हैं। इसलिए इन देशों पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होता।
ईरान आधिकारिक तौर पर अपने क्लस्टर हथियार कार्यक्रम के बारे में ज्यादा जानकारी साझा नहीं करता। लेकिन रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक ईरान ने कई बैलिस्टिक मिसाइलें खुद विकसित की हैं।
इनमें प्रमुख नाम हैं-
कुछ रिपोर्टों के मुताबिक क़ादर मिसाइल क्लस्टर वारहेड ले जाने में सक्षम हो सकती है और इसकी मारक क्षमता करीब 2000 किलोमीटर तक बताई जाती है। ईरान की कई मिसाइलें पुराने सोवियत स्कड डिजाइन से प्रेरित मानी जाती हैं।
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इजरायल दुनिया के सबसे मजबूत सैन्य देशों में से एक है। उसके पास कई उन्नत मिसाइल रक्षा प्रणालियां हैं जैसे-
इन सिस्टमों का मकसद दुश्मन की मिसाइलों को हवा में ही नष्ट करना है। फिर भी क्लस्टर मिसाइलें खास तरह की चुनौती पैदा करती हैं। अगर एक मिसाइल हवा में खुलकर कई सबम्यूनिशन गिराती है तो उन्हें रोकना ज्यादा मुश्किल हो सकता है।
इसके अलावा तेल अवीव और उसके आसपास घनी आबादी है, इसलिए अगर कई बमलेट एक साथ गिरें तो नुकसान का दायरा बढ़ सकता है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि, क्लस्टर हथियारों का इस्तेमाल युद्ध की गंभीरता बढ़ने का संकेत हो सकता है। अगर दोनों देशों के बीच हमले इसी तरह बढ़ते रहे तो यह संघर्ष केवल ईरान और इजरायल तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर पूरे Middle East Region पर पड़ सकता है। अगर क्षेत्र के दूसरे देश भी इस संघर्ष में शामिल हो गए तो यह एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है।
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मिडिल ईस्ट पहले से ही दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। यहां वैश्विक ऊर्जा सप्लाई, रणनीतिक समुद्री रास्ते और बड़े सैन्य गठबंधन जुड़े हुए हैं।
ऐसे में अगर इजरायल और ईरान के बीच युद्ध बढ़ता है तो इसका असर केवल इस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।