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भारतीय नौसेना को मिलेंगे 10,000 टन वाले नेक्स्ट-जेन स्टेल्थ डिस्ट्रॉयर, DAC ने Project 18A को दी मंजूरी, 75,000 करोड़ का प्रोजेक्ट

राजनाथ सिंह की DAC ने प्रोजेक्ट 18A को सैद्धांतिक मंजूरी दी, वारशिप डिजाइन ब्यूरो बनाएगा 10,000 टन वाले स्टेल्थ गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर, 75,000 करोड़ से ज्यादा लागत, कॉन्ट्रैक्ट के 5-10 साल बाद डिलीवरी, विशाखापत्तनम क्लास से बड़े।
भारतीय नौसेना को मिलेंगे 10,000 टन वाले नेक्स्ट-जेन स्टेल्थ डिस्ट्रॉयर, DAC ने Project 18A को दी मंजूरी, 75,000 करोड़ का प्रोजेक्ट
डिस्ट्रॉयर फाइल फोटो

नई दिल्ली।  लंबे समय से पेंडिंग 'नेक्स्ट-जेनरेशन डिस्ट्रॉयर' प्रोग्राम को ऑफिशियल बूस्ट मिल गया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) ने 'नेवल प्लेटफॉर्म्स' कैटेगरी के तहत 'प्रोजेक्ट 18A' के अंतर्गत इन एडवांस्ड वॉरशिप्स को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। वारशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन किए जाने वाले ये 'स्टेल्थ गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर' साइज में बड़े और हैवी होंगे। इनमें एडवांस्ड वेपन्स और टेक्नोलॉजीज लगी होंगी, ये भारतीय नौसेना के भविष्य के मेन वॉरशिप्स का हिस्सा बनेंगे। इस प्रोजेक्ट पर 75,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की लागत आ सकती है। कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के 5-10 साल बाद इनकी डिलीवरी शुरू होने की संभावना है। 

33 प्रतिशत बड़े होंगे पुराने जहाजों से

सूत्रों के अनुसार इन आधुनिक वॉरशिप्स का डिस्प्लेसमेंट 10,000 टन से ज्यादा होगा। यह इन्हें विशाखापत्तनम-क्लास डिस्ट्रॉयर (7,400 टन) की तुलना में काफी बड़ा बनाता है। इन युद्धपोतों में ज्यादा फायरपावर, ज्यादा सेंसर्स और अपग्रेडेड टेक्नोलॉजीज व सिस्टम्स होंगे। इन अगली पीढ़ी के वॉरशिप्स के कंस्ट्रक्शन के लिए नियर फ्यूचर में कॉम्पिटिटिव बिडिंग प्रोसेस ऑर्गेनाइज की जाएगी। 

अभी नेवी के पास ऐसे कितने जहाज

इंडियन नेवी के पास अभी लगभग 12-13 नए गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर हैं, जो इसके सरफेस कॉम्बैट फ्लीट की बैकबोन हैं। ये युद्धक जहाज एयर डिफेंस, एंटी-सरफेस वॉरफेयर और एंटी-सबमरीन ऑपरेशंस में कई तरह की क्षमता नौसेना को देते हैं। इनमें विशाखापत्तनम-क्लास (प्रोजेक्ट 15B) के चार डिस्ट्रॉयर — INS विशाखापत्तनम, INS मोरमुगाओ, INS इम्फाल और INS सूरत — शामिल हैं। कोलकाता-क्लास (प्रोजेक्ट 15A) के तीन डिस्ट्रॉयर — INS कोलकाता, INS कोच्चि और INS चेन्नई — हैं। वहीं दिल्ली-क्लास (प्रोजेक्ट 15) के तीन डिस्ट्रॉयर (INS दिल्ली, INS मैसूर, INS मुंबई) हैं। इसके साथ ही सोवियत-निर्मित कुछ डिस्ट्रॉयर (राजपूत-क्लास / काशिन-II / प्रोजेक्ट 61-ME) भी हैं, जिन्हें अब धीरे-धीरे सर्विस से हटाया जा रहा है।

जानें क्या-क्या होता है एक्टिव डिस्ट्रॉयर्स में

भारतीय नौसेना के एक एक्टिव डिस्ट्रॉयर में एंटी-सरफेस, एंटी-एयर और एंटी-सबमरीन वेपन्स का पूरा सेट होता है। इनमें लगभग 16 ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलें, वर्टिकल लॉन्चिंग सिस्टम में रखी गई 32 मीडियम से लॉन्ग-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइलें, ब्रिज के सामने लगी एक 76 mm ओटो मेलारा नेवल गन,  इनकमिंग मिसाइलों और एयरक्राफ्ट्स से बचाव के लिए चार AK-630 30 mm गैटलिंग गन,  हैवी टॉरपीडो फायर करने में कैपेबल 21-इंच की टॉरपीडो ट्यूब होता है। इसके साथ ही दो RBU-6000 एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर शामिल होते हैं।

नए हथियार होंगे नए जहाजों पर

भविष्य के डिस्ट्रॉयर में इन घातक हथियारों के अलावा और भी बहुत कुछ होगा। रक्षा मंत्रालय के के अनुसार DAC द्वारा मंजूर किए गए कुल डिफेंस प्रपोजल्स में से 82% को 'आत्मनिर्भर भारत' फ्रेमवर्क के तहत डोमेस्टिक डिफेंस इंडस्ट्री के लिए रिजर्व किया गया है। इसलिए, फ्यूचर के डिस्ट्रॉयर में स्वदेशी टेक्नोलॉजी और उपकरणों का हिस्सा ज्यादा होने की संभावना है। इससे आयात पर कम निर्भर होना होगा।

Puneet Pandey
By Puneet Pandey

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