Garima Vishwakarma
14 Jan 2026
भोपाल। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह राज्यसभा के दो टर्म पूरा करने के बाद तीसरी बार राज्यसभा के लिए उत्सुक नहीं हैं। वे पहले ही कह चुके हैं कि किसी को भी दो बार से ज्यादा राज्यसभा नहीं भेजना चाहिए, ऐसे में यह नियम उन पर लागू किया और अपनी सीट खाली होने पर फिर से दावेदारी से इनकार किया है। उनका कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को समाप्त हो रहा है।
दिग्विजय सिंह का राज्यसभा का कार्यकाल ऐसे समय खत्म हो रहा है, जब कांग्रेस मध्यप्रदेश में लगातार चुनावी असफलताओं के बाद संगठनात्मक पुनर्गठन और नेतृत्व परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। पार्टी के भीतर इसे वरिष्ठ नेताओं के मार्गदर्शक भूमिका में जाने और नई पीढ़ी को आगे लाने की पहल के तौर पर देखा जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, राजनीति के माहिर खिलाड़ी दिग्विजय सिंह के हर कदम में गहरा संदेश होता है। उनका राज्यसभा नहीं जाना कांग्रेस नेतृत्व के उस संकेत को भी मजबूत करता है, जिसमें पार्टी अब संसदीय राजनीति में नई ऊर्जा और नए चेहरों को अवसर देना चाहती है। साथ ही यह कदम गुटीय संतुलन साधने की कोशिश भी माना जा रहा है। पार्टी उन नेताओं को प्राथमिकता दे सकती है जो संगठनात्मक मजबूती के साथ-साथ भविष्य की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकें।
यदि दिग्विजय सिंह तीसरी बार राज्यसभा नहीं जाते हैं, तो मध्यप्रदेश कांग्रेस से कई नामों पर चर्चा तेज हो सकती है। इनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री और मजबूत ओबीसी चेहरा अरुण यादव का नाम प्रमुखता से आता है, जिनकी संगठन में स्वीकार्यता है। वहीं मीनाक्षी नटराजन को भी अपर हाउस का टिकट मिल सकता है। राहुल गांधी की करीबी होने का उन्हें फायदा मिल सकता है। इसी तरह राहुल के एक अन्य नजदीकी नेता कमलेश्वर पटेल हैं। हालांकि कमलेश्वर कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य हैं। इनके अलावा वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी को भी पार्टी राज्यसभा भेजकर उन्हें और मजबूत बना सकती है। उधर, कमलनाथ अपने गुट के किसी नेता को राज्यसभा सदस्य बनवाने की कोशिश कर सकते हैं। इनमें पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा का नाम भी है। वर्मा अनुसूचित जाति वर्ग से भी आते हैं। इनके अलावा संगठन से जुड़े युवा नेता को भी अवसर दे सकती है।
दिग्विजय सिंह का यह फैसला कांग्रेस के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है। यह देखना अहम होगा कि पार्टी इसे केवल एक सीट के बदलाव तक सीमित रखती है या इसे व्यापक संगठनात्मक और राजनीतिक पुनर्संरचना का आधार बनाती है। मध्यप्रदेश कांग्रेस के लिए आने वाले राज्यसभा चुनाव न सिर्फ संसदीय प्रतिनिधित्व, बल्कि पार्टी के भविष्य की दिशा तय करने वाले साबित हो सकते हैं।