साथी हाथ बढ़ाना...भील आदिवासियों की ‘हलमा’ परंपरा ने बदली झाबुआ-आलीराजपुर की सूरत

झाबुआ में हलमा परंपरा से शिव गंगा संस्था ने श्रमदान कर 15 साल में 133 तालाब बना दिए हैं। इससे इलाके में सिंचाई के साथ पीने के पानी की समस्या दूर हुई है। बड़ी बात यह है कि तालाब निर्माण के लिए कोई आर्थिक सहयोग नहीं लिया गया।
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भील आदिवासियों की ‘हलमा’ परंपरा ने बदली झाबुआ-आलीराजपुर की सूरत
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    हर्षित चौरसिया, जबलपुर। झाबुआ जिले के सुरीनाला, राखड़िया, फुलेड़ी, झराडाबर, सेमलपाड़ा, भील कोटड़ा, भीम फलिया और आलीराजपुर जिले के ग्रमा तंडाला, अमनकुआं आदि गांवों में डेढ़ दशक पहले तक गर्मी का सीजन आते ही पानी का गंभीर संकट खड़ा हो जाता था। आदिवासियों को पीने के पानी के लिए भरी गर्मी में इधर, उधर भटकना पड़ता था। अब यह समस्या खत्म हो गई है। शिव गंगा संस्था द्वारा भील आदिवासियों की हलमा परपंरा (परस्पर सहयोग) के तहत बीते 15 सालों में 133 बड़े तालाब निर्मित किए जा चुके हैं। अब इनमें भरपूर पानी रहता है। इससे न केवल पीने, बल्कि सिंचाई की समस्या भी दूर हो गई है। 

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    शिव गंगा संस्था में 6 हजार सदस्य

    संस्था के प्रमुख राजाराम कटारा ने जबलपुर प्रवास के दौरान पीपुल्स समाचार से चर्चा की। उनके अनुसार, उनकी संस्था में 6 हजार सक्रिय सदस्य हैं, जो जल सरंक्षण, जंगल, जमीन, पशुजन, आरोग्य, इमेज वर्सेज रियलटी सहित 17 आयामों पर काम कर रहे हैं। इन सदस्यों में 1320 गांवों के भील परिवार भी शामिल हैं। वह कहते हैं, संस्था ने हलमा परंपरा के तहत अगले 12 साल में इन दोनों जिलों में 3 हजार छोटे-बड़े तालाब तैयार करने का लक्ष्य तय किया है। 

    3 लाख कंटूर ट्रेंच किए तैयार

    संस्था ने हलमा परंपरा के तहत भील परिवारों के साथ मिलकर 15 साल में 3 लाख कंटूर ट्रेंच तैयार कर लिए हैं। कंटूर ट्रेंच (बारिश का पानी संरक्षित करने के लिए होता है, एक कंटूर ट्रेंच 2.5 फीट चौड़ा और 2 मीटर गहरा होता है।) इसे तैयार करने से यहां के किसान अब एक साल में दो फसल लेने की स्थिति में आ गए हैं।

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    गर्मी के सीजन में खोदते हैं गड्ढे

    जल संरक्षण के लिए बारिश के पूर्व ग्रीष्मकाल में गड्ढे  खोदे जाते हैं। इनमें संस्था से जुड़े भील आदिवासी महिला-पुरुष श्रमदान करते हैं। बारिश के दौरान इन गड़ढों में पानी एकत्रित होता है।

    क्या है हलमा परंपरा

    भील परिवारों में एक परंपरा होती है, जिसे हलमा कहा जाता है। इसके तहत यदि कोई परिवार किसी भी प्रकार के संकट से गुजर रहा होता है और वह मदद मांगता है तो सभी मिलकर नि:स्वार्थ भाव से उसकी मदद करते हैं। शिव गंगा संस्था ने इसी पंरपरा को झाबुआ और आलीराजपुर जिलों में शुरू किया।

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    खेतों की सिंचाई आसान हो गई

    3-4 साल पहले तक यहां पानी की समस्या गंभीर थी। सिंचाई के साधन नहीं होने से एक बीघा में खेती करता था और सालभर में बमुश्किल से एक फसल ले पाता था। हलमा परंपरा के तहत बनाए गए तालाब से खेतों की सिंचाई आसान हो गई है। अब साल में दो फसल तक ले लेते हैं। पीने के पानी की समस्या से भी निजात मिल गई है।

    कमेश डामोर, किसान, ग्राम लिम, झाबुआ

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    शिव गंगा संस्था ने अच्छा काम किया

    हलमा के तहत झाबुआ जिले में शिव गंगा संस्थान द्वारा जल संरक्षण की दिशा में काफी अच्छा काम हो रहा है। इससे यहां पानी की समस्या काफी हद तक कम हुई है।

    नेहा मीणा, कलेक्टर, झाबुआ

    Naresh Bhagoria
    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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