ग्वालियर:MP हाईकोर्ट का फैसला, प्राचार्य चयन में अल्पसंख्यक संस्थानों को आजादी; सीनियरिटी नियम लागू नहीं

ग्वालियर। कोर्ट ने कहा कि संस्थान अपने प्राचार्य का चयन खुद कर सकते हैं। सरकार वरिष्ठता का नियम थोपने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। कुछ सरकारी सर्कुलरों को इस संदर्भ में निरस्त कर दिया गया है। यह फैसला संस्थानों की स्वायत्तता को मजबूत करता है।
कोर्ट का स्पष्ट संवैधानिक रुख
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की युगल पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को अपने प्रशासनिक फैसले लेने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि यह अधिकार संविधान द्वारा मिले हुए है और इसे सीमित नहीं किया जा सकता। प्राचार्य जैसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति संस्थान की जरूरतों के अनुसार होनी चाहिए। इस प्रक्रिया में बाहरी हस्तक्षेप उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी माना कि संस्थान अपनी कार्यशैली और उद्देश्य के अनुरूप निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
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'चयन प्रक्रिया में योग्यता को मिले प्राथमिकता'
सुनवाई के दौरान पीठ ने प्राचार्य की भूमिका को केंद्रीय बताया। कोर्ट ने कहा कि किसी भी शिक्षण संस्थान में अनुशासन, प्रशासन और शिक्षा की गुणवत्ता का निर्धारण प्राचार्य करता है। इसलिए चयन प्रक्रिया में योग्यता और नेतृत्व क्षमता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। केवल वरिष्ठता के आधार पर नियुक्ति करना उचित नहीं माना गया। संस्थान को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। यह दृष्टिकोण शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने की दिशा में अहम है।
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कोर्ट ने सरकारी सर्कुलरों को किया निरस्त
कोर्ट ने 25 अगस्त 2021 और 8 सितंबर 2021 को जारी सरकारी सर्कुलरों को निरस्त कर दिया। इन सर्कुलरों में वरिष्ठतम शिक्षक को प्रभारी प्राचार्य बनाने का प्रावधान था। अदालत ने कहा कि यह नियम अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू नहीं किया जा सकता। इस फैसले से स्पष्ट हुआ कि सरकार संस्थानों के आंतरिक निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। यह निर्णय संस्थानों के अधिकारों की रक्षा करता है। साथ ही यह प्रशासनिक स्वतंत्रता को भी सुनिश्चित करता है।
चयन प्रक्रिया में कोर्ट का हस्तक्षेप नहीं
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर मैनेजमेंट किसी योग्य व्यक्ति का चयन करता है, तो उसकी उपयुक्तता पर सवाल नहीं उठाया जाएगा। सरकार या कोर्ट इस प्रक्रिया में दखल नहीं देंगे। यह निर्णय संस्थानों के भरोसे को बढ़ाने वाला है। इससे प्रबंधन को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में सुविधा मिलेगी। चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और योग्यता को प्राथमिकता मिलेगी। यह व्यवस्था संस्थानों को मजबूत बनाएगी।
सिंगल बेंच का फैसला पलटा
पहले सिंगल बेंच ने शासन के पक्ष में निर्णय दिया था। लेकिन युगल पीठ ने उस फैसले को पूरी तरह पलट दिया। कोर्ट ने प्रबंधन के अधिकार को सही ठहराया और सरकारी हस्तक्षेप को अनुचित माना। इस फैसले से संस्थानों को बड़ी राहत मिली है। यह निर्णय भविष्य के मामलों के लिए भी मार्गदर्शक साबित होगा।












