Kanha Tiger Reserve:शावकों की मौत से शुरू हुआ सिलसिला, आखिर किस वायरस ली बाघिन की जान?

मध्यप्रदेश। मशहूर कान्हा टाइगर रिजर्व से आई एक खबर ने वन्यजीव प्रेमियों और विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। यहां एक बाघिन और उसके चार शावकों की मौत ने पूरे रिजर्व में हलचल मचा दी है। जहां कभी बाघों की दहाड़ सुनाई देती थी, वहां अब सन्नाटा सा माहौल नजर आ रहा है। सिर्फ 9 दिनों के अंदर एक पूरे बाघ परिवार का खत्म हो जाना सामान्य बात नहीं मानी जा रही। शुरुआत में इन मौतों को रहस्यमयी माना गया था लेकिन अब शुरुआती जांच में केनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) संक्रमण की पुष्टि होने से मामला और गंभीर हो गया है।
9 दिनों में खत्म हो गया पूरा परिवार
यह मामला रिजर्व के सरही क्षेत्र का है, जहां बाघिन टी-141 अपने चार शावकों के साथ रह रही थी। अप्रैल के आखिरी हफ्ते में अचानक हालात बिगड़ने लगे। सबसे पहले 21 अप्रैल को एक शावक मृत पाया गया। इसके बाद 24 और 25 अप्रैल को दो और शावकों की मौत हो गई। शुरुआत में यह माना गया कि शावक भूख और कमजोरी के कारण मर रहे हैं, क्योंकि उनके पेट खाली पाए गए थे, स्थिति तब और गंभीर हो गई जब बाघिन और एक बचा हुआ शावक भी बीमार पड़ गए। दोनों को बचाने के लिए वन विभाग ने उन्हें तुरंत मुक्की क्षेत्र के क्वॉरेंटाइन सेंटर में शिफ्ट किया। इलाज शुरू किया गया लेकिन 29 अप्रैल को दोनों ने भी दम तोड़ दिया। इस तरह सिर्फ 9 दिनों के भीतर पूरा बाघ परिवार खत्म हो गया, जिसने सभी को हैरान कर दिया।

बीमारी ने बढ़ाई चिंता
शुरुआती जांच में मौत का कारण स्पष्ट नहीं था लेकिन अब जांच में केनाइन डिस्टेंपर वायरस संक्रमण की आशंका सामने आई है। यह वायरस आमतौर पर मांसाहारी जानवरों को प्रभावित करता है और तेजी से फैल सकता है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शावकों के फेफड़ों में संक्रमण के संकेत मिले हैं, जो इस वायरस के लक्षणों से मेल खाते हैं। साथ ही, जानवरों में कमजोरी, भूख न लगना और सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं भी सामने आई थीं।अंतिम पुष्टि लैब रिपोर्ट आने के बाद ही होगी ।

कैसे फैलता है यह संक्रमण
यह वायरस अक्सर कुत्तों के जरिए जंगल में पहुंचता है। आसपास के गांवों में रहने वाले पालतू या आवारा कुत्ते इस संक्रमण के मुख्य स्रोत माने जाते हैं। जब ये संक्रमित कुत्ते जंगल के आसपास घूमते हैं या जंगली जानवर उनके संपर्क में आते हैं, तो बीमारी तेजी से फैल सकती है। संभावना यह भी जताई जा रही है कि बाघिन ने किसी संक्रमित शिकार को खाया हो, जिससे यह वायरस उसके शरीर में पहुंचा। इसके बाद यह संक्रमण शावकों तक फैल गया। यही वजह है कि कम समय में पूरा परिवार इसकी चपेट में आ गया।
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क्या समय पर नहीं हुई कार्रवाई
इस घटना के बाद वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय जानकारों का मानना है कि अगर पहले शावक की मौत के बाद तुरंत सभी जानवरों को रेस्क्यू कर लिया जाता, तो शायद कुछ जान बचाई जा सकती थी। विभाग का कहना है कि लगातार निगरानी की जा रही थी और जैसे ही स्थिति गंभीर हुई तुरंत कदम उठाए गए। फिर भी इतनी तेजी से हुई मौतों ने सिस्टम की तैयारियों पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
कुत्तों का टीकाकरण
अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस संक्रमण को बाकी बाघों तक फैलने से कैसे रोका जाए। वन विभाग ने प्रभावित इलाके में निगरानी बढ़ा दी है और आसपास के क्षेत्रों में सतर्कता बरती जा रही है। इसके साथ ही गांवों में कुत्तों के वैक्सीनेशन पर जोर दिया जा रहा है, क्योंकि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बड़ी संख्या में कुत्तों का टीकाकरण हो जाए, तो इस वायरस की चेन को तोड़ा जा सकता है। जंगल के आसपास एक सुरक्षित इम्यून जोन बनाना भी जरूरी माना जा रहा है।
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